साई के भक्त आमतौर पर
एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए ‘साईराम’
बोलते हैं. साई के साथ राम! क्या साई
और राम को हम एक ही मानते हैं? क्यों किसी और अवतार के साथ साई बाबा का नाम जोड़ कर
लगातार नहीं बोला जाता जबकि सद्गुरू साई में तो सभी अवतार निहित हैं! जब साई सदेह
थे तो उनके समकालीन लोगों ने अपने इष्ट या आराध्य को साई में अलग-अलग अवसरों पर
देखा. किसी को कृष्ण तो किसी को दत्तात्रेय साई में दिखे. किसी को कृष्ण तो किसी
को अपने गुरु घोलप स्वामी. किसी को अक्कलकोट के स्वामी समर्थ साई में दिखे तो मेघा
साई को शंकर मानकर ही उनकी पूजा करता. एक डॉक्टर तो शिर्डी आये ही इसी शर्त पर थे कि
वो बाबा को मुसलमान मानते हैं और उनके आगे नमन नहीं करेंगे लेकिन जब बाबा में उनको
अपने आराध्य रामचंद्र भगवान् दिखे तो उन्होंने न सिर्फ़ बाबा को नमन किया बल्कि उन्हें
बाबा के दर्शन कर परम आनंद की अनुभूति भी हुई. इसी तरह 1916 में बाबा से पैसे मिलने
की लालच में शिर्डी आई मद्रासी भजन मंडली की महिला प्रमुख को बाबा ने सीतानाथ यानि
रामचंद्र भगवान् के रूप में दर्शन दिए. जैसा
भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का..
जब बाबा में सभी को
अपने-अपने इष्ट के दर्शन हुए तो फिर सामान्य उद्बोधन और अभिवादन में साई और राम के
जुड़ने की कोई न कोई तो वजह होगी ही. यह भी साई की ही एक लीला है और साई की लीलाओं
में कई सारे अर्थ निहित होते हैं. क्या हम सभी को साई और राम के चरित्र में कोई या
कई सारी समानताएं दिखती हैं?
भगवान् विष्णु के दस
अवतारों में सातवें, राम की अपनी महिमा और उनके चरित्र की महत्ता अपना अलग स्थान
भक्तों के मन में रखती है. दशरथ और कौशल्या के ज्येष्ठ पुत्र रामचंद्र को युगपुरुष
माना जाता है.
अपने पिता के वचन को
निभाने के लिए उन्होंने राजगादी का मोह छोड़, चौदह वर्ष वन में बिताये. साई के
माता-पिता के बारे में किसी को स्पष्ट रूप से मालूम नहीं है. साई को तो अयोनिज
माना जाता है. जो किसी भी योनि से उत्पन्न न हुआ हो. ऐसे में सर्वशक्तिमान ईश्वर
को साई की उत्पत्ति का मूल माना जा सकता है. उसी सर्वशक्तिमान ईश्वर की संतान होते
हुए साई ने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा एक वनवासी की तरह ही बिताया. एक टूटी हुई
ईमारत, जो कि एक पुरानी मस्जिद थी, को अपना बसेरा बनाने से पूर्व साई को शिर्डी
में या तो नीम के पेड़ के नीचे तपस्या में बैठा देखा गया या फिर जंगलों और पहाड़ों
में भटकते हुए. साई तो उस मस्जिद में रहते हुए भी बारिश में टूटे-फूटे फर्श पर ही
सोते और फटी हुई टाट का टुकड़ा उनका आसन होता. साई का जीवन तो राम के वनवास जैसा ही
रहा.
राम ने गुरु वशिष्ठ के
प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखा और उनके बताये मार्ग से कभी भी भटके नहीं. मीठे पत्तों
वाले कड़वे नीम को तो साई ने अपने गुरु का धाम बताया. अपने गुरु और उसी नीम के
प्रति उनकी अखंड, अगाध श्रद्धा ने साई को सद्गुरू का दर्जा दिया. अपने गुरु की सीख
पर साई ने अपना जीवन जिया और उन्हीं के सदृश साई ने अपने भक्तों को अपने गुरु की
शिक्षा का अंश बांटा. अपने गुरु के प्रति इसी आदर भाव ने साई को आराध्य बनाया.
केवट और शबरी की सेवा
लेकर राम ने जन्म से प्राप्त जाति के भेद को निर्मूल कर दिया. बायज़ामाई द्वारा
बलपूर्वक भोजन खिलाने के पूर्व साई एक वनवासी की ही तरह कंद-मूल पर ही रहते ऐसा
माना जाता है. ईश्वर का अंश होते हुए भी उन्होंने एक साधारण भिक्षुक की तरह अपना
निर्वाह मांग कर ही किया. भक्तों के बचे, जूठे भोजन को ग्रहण कर, साई ने अपने को
भिक्षा दान देने वालों को शबरी का दर्जा दे दिया. इस तरह जो भी भोजन मिलता, साई
उसमें से कुछ लेकर बाकी बचा हुआ सभी के ग्रहण करने के लिए छोड़ देते. साई का प्रसाद
उनके आश्रितों के लिए इस तरह महाप्रसाद बन जाता. साई ने भी कभी जाति के भेद को
अपने जीवन में स्थान नहीं दिया. उनके पास कभी भी कोई भी जा सकता था और अपने इष्ट को
छू सकता था. इसी भाव को जागृत करते हुए साई ने कहा भी तो था, “अपने बीच की तेली की दीवार गिरा दो.”
लक्ष्मण, भरत और
शत्रुघ्न के भाई के रूप में रामचंद्र भगवान् ने आदर्श बड़े भाई का रूप निभाया और
अपने भाइयों को न सिर्फ़ वात्सल्य से सराबोर रखा बल्कि उनकी हमेशा रक्षा की. साई ने
भी अपना प्यार न केवल अपने भक्तों में बांटा बल्कि श्री साई सच्चरित्र में ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं कि साई को ही
अपने प्राणों का आधार मानने वालों की साई ने अपनी देह को तकलीफ़ देकर और अपने प्राण
न्यौछावर कर के भी रक्षा की.
जिस तरह राम ने राज्य
का मोह छोड़, छोटे भाई भरत को सम्पूर्ण राजपाट दे दिया था उसी तरह साई ने कभी भी
अपने स्थान का मोह नहीं रखा. श्री साई
सच्चरित्र में उल्लेख आता है कि एक बार जब नानावल्ली ने साई को उनके स्थान से
अपमानपूर्वक उठा दिया था तब भी साई के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और न ही उस स्थान
से उठाये जाने का कोई दुःख.
माया के बल पर रूपसी
बनकर आयी शूर्पणखा की सम्मानपूर्वक अनदेखी कर अर्धांगिनी सीता के प्रति उनके भाव
ने राम को एकनिष्ठ, अव्यभिचारिणी निष्ठा का प्रतीक बनाया. इसी तरह साई के मन में
कभी किसी स्त्री को देख कर लंपटता के भाव उत्पन्न नहीं हुए. रामभक्त हनुमान की तरह
साई ने अखंड ब्रहमचर्य को निभाया और राम के सेवक के गुण भी अपने अन्दर आत्मसात कर
लिए. हनुमान की स्वामी-भक्ति को स्वीकार कर राम ने हनुमान को मान दिया. हनुमान के
बिना राम की और राम के बिना हनुमान की तो कल्पना भी करना कठिन है. साई तो सदा मस्जिद
में आई प्रत्येक महिला को आई या माई कह कर ही संबोधित करते. साई का मन तो सदा ही
ईश्वर में स्थापित रहता. उसे कोई भी प्रलोभन कभी अपने स्थान से डिगा न सका.
वन से लौटकर राम ने एक
आदर्श स्थापित कर राजपाठ चलाया. साई ने भी बिना किसी भेद-भाव के अपने भक्तों की
इच्छा उसकी योग्यता अनुसार पूरी की. द्वारकामाई मस्जिद से तब भी और आज भी साई के
भक्तों को काम, अर्थ, ज्ञान और मोक्ष उनके प्रारब्ध और कर्मों के अनुसार मिलता ही रहा
है.
उदाहरण स्थापित करते
हुए राम ने राज्य के एक नागरिक के संशय ज़ाहिर करने पर उसी प्राणप्रिय सीता का
गरिमापूर्ण त्याग किया. अपने आज्ञाकारी सेवक माधव फासले के हाथों एक ईंट के टूटने
पर बाबा ने भी अपनी जीवन संगिनी का दूर होना कहा था और उसके टूटने को अपने स्वधाम
गमन का प्रतीक माना था.
समय आने पर रामचंद्र
भगवान् ने सरयू नदी में अंतर्ध्यान होकर अपनी देह का त्याग किया. साई ने भी राम की
रावण पर विजय वाले दिन को ही देह-त्याग के लिए चुना. चुना इसलिए कहा गया है
क्योंकि साई ने इस बात के पुष्ट संकेत दो साल पहले से ही देना प्रारम्भ कर दिए थे.
राम ने आजीवन मर्यादा
को ही जिया. साई ने भी आजीवन पूर्ण मर्यादा का ही पालन किया. जिस तरह राम का जीवन
एक आदर्श के रूप में हमारे सामने आता है उसी तरह साई का जीवन भी हम भक्तों के लिए
सदा ही आदर्श है.
शिर्डी में रामनवमी
उत्सव
रामनवमी, गुरु पूर्णिमा और समाधि-दिवस के तीन उत्सव शिर्डी
में आज भी मुख्य रूप से मनाये जाते हैं. इन तीनों ही मौकों पर तीन दिन तक शिर्डी
में उल्लास और उत्साह का माहौल रहता है. पूरे क्षेत्र को दुल्हन से समान सजाया
जाता है, श्री साई सच्चरित्र का पारायण किया जाता है, भजन-कीर्तन से वातावरण
गुंजायमान हो जाता है, शोभा-यात्राएं निकाली जाती हैं, दूर-दूर से श्रद्धालु पालकी
लेकर चलते हुए बाबा के दर पर पहुँचते हैं. बाबा की पावन समाधि के दर्शनों के लिए
लंबी-लंबी कतारें लगती हैं. नारदीय कीर्तन प्रणाली के प्रतीक-स्वरुप वीणा लेकर,
पोथी के साथ बाबा की पादुकाएँ और सटका लेकर श्री साई बाबा संस्थान विश्वस्त
व्यवस्था के विश्वस्त और अधिकारी इनको सम्मानपूर्वक बाबा की समाधि को लेकर जाते
हैं. इस पूरी व्यवस्था में पहला दिन उत्सव का प्रारम्भ गिना जाता है तो दूसरा
मुख्य दिवस और तीसरे दिन को अंतिम दिन माना जाता है. इनमें रामनवमी और गुरु
पूर्णिमा उत्सव बाबा के समय से, उन्हीं की आज्ञा से मनाये जाते हैं. दहशरा उत्सव
बाबा के बाद शिर्डी में मनाया जाने लगा.
उर्स
की शुरुआत
नीमगाँव निवासी संतानहीन नानासाहेब डेंगले को बाबा के
आशीर्वाद से ही शादी के कई सालों बाद संतान हुई तो उन्होंने बाबा को सोने के लिए
लकड़ी का वो एक हथेली चौड़ा और तीन हाथ लम्बा पटला भेंट में दिया था जिसे बाबा
चिंदियों से बाँध कर, छत से लटकाकर, उसके चारों कोनों पर दीपक जला कर, चैन से सोते
थे. इन्हीं नानासाहेब डेंगले के मित्र थे कोपरगाँव के सर्किल इंस्पेक्टर गोपालराव
गुंड, जो नानासाहेब की ही तरह संतानहीन थे. तीन शादियों के बावजूद उनके घर किलकारी
नहीं गूँज पाई थी. नानासाहेब के कहने पर उन्होंने बाबा से संतान मांगी और उन्हें
मिली भी. घर में ख़ुशी का माहौल बन गया.
इसी
ख़ुशी को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके मन में विचार आया कि साई बाबा का उर्स मनाया
जाए. उन्होंने इस बारे में दादा कोते, तात्या कोते
और शामा से बात की. सभी को यह ख़याल अच्छा लगा लेकिन बाबा से अनुमति लिए बगैर तो
शिर्डी में कुछ हो ही नहीं सकता था. बाबा से इस बाबत अनुमति चाही गयी और बाबा से
अनुमति मिल भी गयी. रामनवमी के दिन ही उर्स भरने की अनुमति बाबा द्वारा दी गयी.
महान सुखद संयोग!
पश्चिम एशिया में सूफ़ी सम्प्रदाय में उर्स मनाने की परम्परा
रही है. आमतौर पर उर्स तो सूफ़ी संतों की पुण्यतिथि पर मनाया जाता है. इन संतों को
ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है और उनकी मृत्यु को ईश्वर से एकाकार होने का अवसर
मानकर उत्सव एक शादी के रूप में मनाया जाता है. इस मामले में साई बाबा की विशेषता
रही कि वे दुनिया के एकमात्र ऐसे संत माने
जाते हैं जिनके जीते जी उनका उर्स मनाने की परंपरा प्रारम्भ हुई.
उर्स को मनाने के लिए स्थानीय कलेक्टर से शासकीय अनुमति
चाही गयी. शासकीय प्रक्रिया के पालन में कलेक्टर ने शिर्डी के कुलकर्णी (पटवारी)
से अभिमत माँगा. इर्ष्या के चलते उन्होंने अनुमति नहीं दिए जाने सम्बन्धी अभिमत
दिया. लेकिन बाबा की अनुमति थी तो साई के भक्तों ने इस बाबत एक बार और प्रयास
किया. इस बार अनुमति मिल गयी.
इस
तरह 1897 से शिर्डी में साई बाबा का उर्स मनाया जाने लगा. इस उर्स में बहुत अधिक संख्या में लोग आते. कई सारी
दुकानें लगती. कव्वालियाँ गाई जाती. कुश्तियां होती. बाहर से पानी मंगवाया जाता.
शिर्डी साई की आभा से दमकती रहती.
हिन्दू-मुस्लिम
एकता
इस उर्स का स्वरुप बढ़ता गया. गुंड के ही मित्र थे दामू
अन्ना कासार. उन्हें भी बाबा की कृपा से संतति प्राप्त हुई थी. उन्होंने गुंड के
कहने पर इस उर्स के लिए ध्वज दिया. एक दूसरा ध्वज नारंगी और हरे रंग में नानासाहेब
निमोणकर ने दिया. जुलूस में दोनों ध्वज लाये जाते और द्वारकामाई के ऊपर स्थापित कर
दिए जाते. आगे बाबा के एक और भक्त अमीर शक्कर को हुई प्रेरणा पर इसी उर्स में चंदन
उत्सव की शुरुआत हुई. बहुत सारा चंदन और धूप घिस कर थालियों में भरा जाता है और
लोभान जलाया जाता है. इसको जुलूस में मस्जिद लाया जाता. धूप और चंदन नीम और मस्जिद
की दीवारों पर डाल दिया जाता.
हिन्दुओं का ध्वज और मुसलमानों की चंदन यात्रा एक साथ चलने
लगी. प्रत्येक वर्ष यह उर्स रामनवमी के दिन ही भरता.
उर्स
जो उत्सव बन गया
इस अद्भुत् संयोग के चलते 1911 में श्री कृष्णराव जोगेश्वर
भीष्म को प्रेरणा हुई, लक्ष्मण उर्फ़ काका महाजनी से साझा की और बाबा की अनुमति से
उर्स में राम-जन्म, कीर्तन और गोपालकाला जोड़ कर इसे रामनवमी उत्सव का स्वरुप दिया
गया. उस वर्ष राम-जन्म का गायन भीष्म ने ही किया और बाद में बालाबुवा सुतार,
सातारकर और दासगणु महाराज ने यह ज़िम्मेदारी सम्हाली. उर्स उत्सव बन गया.
बाबा भली कर रहे।।
श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु। शुभं भवतु।