Friday, 24 March 2017

साई बाबा का सातवां वचन

जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का
                                                                                
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श्री साई अमृत कथा में बाबा के 11 वचनों में से सातवें वचन के बारे में बताते हुए ‘भाईजी’ सुमीतभाई पोंदा कहते हैं कि बाबा का यह सातवां वचन – जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का – साई के भक्तों को परस्परता का भाव सिखाता है. जैसा हमारे मन का भाव होगा, साई के मन का रूप भी वही हो जायेगा. भाव में ही साई बसते हैं, इस सत्य को यह वचन सुदृढ़ करता है, बल देता है. जितनी शक्ति हम अपने भाव को देंगे, उतना ही बल हम साई के मन को भी देंगे. यह वचन इसी भाव की महिमा का गान है.
भाव मन की सहज उत्पत्ति होते हैं जिन्हें जब हम अपनी इच्छा-शक्ति से प्राण देते हैं तो वो फलीभूत होते हैं. भाव से ही विचार और विचारों से कर्म बनते हैं. इन्हीं कर्मों से हम अपना नसीब या प्रारब्ध गढ़ते हैं. स्पष्ट है, भाव से ही हम बनते हैं. भाव से ही हमारी सृष्टि का निर्माण होता है.
परम सत्ता, जिसे हम ईश्वर कहते हैं, में तो कोई क्रिया है नहीं. वह निर्गुण, निराकार है. उसमें तो भाव भी नहीं है. जिसके पास जो नहीं होता, उसे वही चाहिए भी होता है. देवता इसीलिए मानव रूप लेकर इस धरती पर आते हैं कि वो भावजनित भक्ति का सुख और आनंद ले सकें. इसीलिए कहते हैं कि ईश्वर भाव का भूखा है. उसने अपनी अर्धांगिनी माया या प्रकृति को इस सृष्टि की रचना का निमित्त बनाया और इस सृष्टि की समस्त रचना माया के भाव से ही हुई. सुन्दर भाव लेकर प्रकृति ने इस सृष्टि को इतना सुन्दर बनाया. प्रकृति ने ही भगवान् की भी रचना की क्योंकि सृष्टि स्वयं इतनी व्यापक और सामर्थ्यवान नहीं थी कि वह इतनी विशाल रचना को गतिमान रख सके. उसी ने भगवान् के तीन रूपों को बनाया. रचियता या निर्माता के रूप में ब्रह्मा, स्थितिकर्ता के रूप में विष्णु और नवनिर्माण के देव के रूप में महेश.
चूंकि भगवान् स्वयं अपने कर्म-क्षेत्र को भोग नहीं सकते इसलिए भगवान् के गुण लेकर मनुष्य बनाये गए. भगवद् आचरण लिए परिपूर्ण मनुष्य ही अवतार के रूप में जाने जाते हैं. जिस मनुष्य में भगवान् का भाव प्रदीप्त या उज्जवल रहता है, वह अवतार माने जाते हैं. अपने भाव से ही मनुष्य भगवान् को महसूस कर सकता है और इन्हें अपने कर्मों से बल देकर ख़ुद भगवान् का दर्जा भी प्राप्त कर सकता है. सिर्फ़ भाव का ही महत्त्व है. 

कस्तूरी तो मृग की नाभि में होती है. नाभि में कस्तूरी की सुगंध लिए इसी सुगंध को ढूँढने के लिए वह वन-वन भटकता है. वैसे ही मानव ने कभी भगवान् को देखा नहीं लेकिन उसने इस सृष्टि के निर्माता, स्थितिकर्ता और संहारकर्ता के रूप में भगवान् की अवधारणा को अपने भाव से बल दिया. ये भाव उसी कस्तूरी की सुगंध है. भाव में भगवान् की उपस्थिति से हमारे विश्वास को बल मिलता है. भगवान् की खोज हमारे अस्तित्व को बनाये रखती है. हमें निडर हो कर जीने का साहस मिलता है. भगवान् की उपस्थिति का अहसास हमें बुराई के मार्ग से दूर रहने की सीख देता है. यही भाव अंतरात्मा भी कहलाता है. जो इसकी सुन लेता है वह अपनी अच्छाई को बल देकर बुराई से दूर रहता है और जो इसे नहीं सुनता, वह अपने अन्दर के भगवद् तत्त्व को शक्तिहीन बना देता है और दानव बन जाता है. हमारे भाव में ही देव और दानव बसते हैं.
जो काम सहज ही मानव देह की सीमाओं से परे लगता है वह भाव से ही संभव हो जाता है. हमारी सीमित बुद्धि इसका श्रेय भगवान् को देती है. इनको सहज भाषा में चमत्कार भी कहा जाता है. चमत्कार कहीं बाहर से नहीं होते. हमारे अपने भावों की प्रगाढ़ता से ही चमत्कार संभव होते हैं. भावों के बंधन में रहने वाले ईश्वर हमारे भावों की तीव्रता के चलते चमत्कार करने को मजबूर हो जाते हैं.
सामान्य मानव बुद्धि के चलते हम चमत्कार को ही नमस्कार करते हैं. उन्हीं में भगवान् को ढूंढते हैं. कुछ लोग तो चमत्कारों को ही भगवान् के होने का साक्ष्य मानते हैं. साई में हमारा विश्वास भी चमत्कार के कारण ही जड़ जमाता है. साई में जब हमारा विश्वास प्रगाढ़ होने लगता है तब इन चमत्कारों की संख्या भी बढ़ती जाती है और फिर कुछ समय के बाद ऐसी घटनाएं, जो एक समय पर हमें चमत्कारी लगती थीं, अब सामान्य लगती हैं. ऐसे ही जब भावों की तीव्रता कम हो जाती है तब चमत्कार भी क्षीण पड़ने लगते हैं.
मन में साई बसते हैं और मन में ही भाव भी. दोनों के एक ही जगह रहने से चुम्बकीय प्रभाव जैसी शक्ति काम करती है. चुम्बक के प्रभाव में लम्बे समय तक रहने पर एक साधारण से लोहे के टुकड़े में भी चुम्बक के लक्षण, थोड़े ही समय के लिए लेकिन, आ ही जाते हैं. यहाँ, हमारे मन में, तो दोनों – साई और हमारे भाव – प्रतिपल साथ में ही रहते हैं. भावों में बसने वाले साई कब ख़ुद हमारे भावों को पवित्र करने लगते हैं पता ही नहीं चलता. साई के साथ में रह-रह कर हमारे भाव साई का स्वरुप धारण कर उनकी शक्तियों को अपने अन्दर समा लेते हैं. भाव साई हो जाते हैं और साई भाव.

भाव दो प्रकार के होते हैं. भक्ति-भाव और सेवा-भाव. अपने इष्ट के प्रति सम्पूर्ण प्रीति का भाव भक्ति भाव कहलाता है. सभी ओर वही दिखता है जिसको हम अपने मन में पूजते हैं. इसमें माथे पर चंदन-तिलक लगाने की वृत्ति जैसा थोथा आडंबर या बार-बार प्रणाम या दण्डवत् करने जैसी मात्र शारीरिक क्रिया का कोई महत्त्व या स्थान नहीं है. प्रीति तो मन से होती है. धन की लालच में साई के दर पर आई मद्रासी भजन मंडली की महिला प्रमुख ने साई को राम के रूप में देखा तो काकासाहेब दीक्षित के ध्यान में वे विट्ठल के रूप में आये. शामा को साई ने भगवान् दत्तात्रेय के रूप में दर्शन दिए तो मुले शास्त्री को उनके गुरु घोलप स्वामी के रूप में. डॉ. पंडित को उन्होंने काका पुराणिक के रूप में दर्शन दे कर अपने गले और माथे पर चंदन लगाने की अनुमति दी. नानासाहेब चांदोरकर के पंढरपुर तबादले पर मस्जिद में पहले ही साई ने उनके भाव के अनुरूप पंढरपुर जाने की भूमिका बना दी थी. दासगणु के संगम स्नान के भाव को जान कर साई ने अपने चरणों से ही पवित्र तीर्थों की धारा बहा दी. सर्प को साई का रूप समझ कर जब बालाजी नेवासकर ने उसे दूध अर्पण किया तो वह बिना किसी को हानि पहुंचाए वहां से चला गया. जैसा जिसके मन का भाव था, उसे वैसे ही बाबा ने दर्शन दिए. उनके भावों में अपने इष्ट के दर्शन की प्रगाढ़ता का मान साई को रखना ही पड़ा. भाव से सभी कुछ संभव है. भाव बिन भक्ति अधूरी है. अधूरी भक्ति से कुछ भी हासिल नहीं होता, वो शक्तिहीन होती है.
 श्रीमति सावित्री तेंदुलकर के भाव थे उसी कारण से बाबा ने उनके पुत्र बाबू तेंदुलकर की कुंडली के ग्रहों की चाल बदल कर डॉक्टर न बन पाने के योग होने के बावजूद उन्हें परीक्षा में पास करवाया. बापूसाहेब बूटी की मृत्यु की भविष्यवाणी को उल्टा कर उनकी मृत्यु को टाल दिया. अनेक प्रकांड ज्योतिषियों की भविष्यवाणी, कि दामूअन्ना कासार के जीवन में संतान सुख नहीं लिखा, को बाबा ने बदल दिया और उनके घर में संतान की उत्पत्ति हुई. ऐसे ही कई निसंतान दम्पत्तियों के घर बाबा ने कई अड़चनों ने बाद भी संतान सुख की प्राप्ति करवाई तो कितनों के ही घर बाबा ने धन-धान्य से भरे. आज भी साई के चमत्कारों की कोई थाह नहीं है. अपने भावों से मिली साई की कृपा के चलते नक्षत्रों की चाल भी बदल जाती है.
शामा के मन में बाबा के प्रति मित्रता का भाव था लेकिन शायद उसके पूर्व कर्मों के चलते धन की कमी उसे रहनी ही थी. बाबा के प्रति शामा के भावों की तीव्रता का अंदाज़ा इसी बात से लग सकता है कि जब वे सोते तो उनकी प्रत्येक श्वासोच्छ्वास के साथ साई का उच्चारण स्पष्ट सुनाई देता. शामा के पास बहुत अधिक धन न होने के बावजूद बाबा की कृपा के चलते उन्होंने एक धनवान व्यक्ति की तरह जीवन बिताया. बाबा ने उसी शामा को बड़े-बड़े धनवान लोगों का, न्यायाधीशों, मामलतदार, जिलाधीशों, महंत और मठाधीशों का संग करवाया. उन्हें सभी जगह बाबा का प्रतिनिधि मानकर लोगों द्वारा उन्हें बहुत आदर और मान, आदर-सत्कार दिया जाता और इन्हीं भक्तों से उन्हें कीमती भेंट, इत्यादि भी मिलती. धनाढ्यों की तरह घोडा-गाड़ी और हाथी की सवारी भी शामा को करने को मिलती. रसूखदार भी बाबा के दर्शन करने के लिए अपनी सिफ़ारिश शामा के माध्यम से ही करवाते. इस तरह अपने भावों के चलते उन्हें बाबा की कृपा से वो ठाठ नसीब हुए जो बड़े-बड़े सेठों को नसीब नहीं होते. शंकर के दर्शन से पूर्व जिस तरह नंदी पूजे जाते हैं, उसी तरह साई बाबा के दर्शनों के पूर्व भक्त शामा से होते हुए ही जाते. साई के सुदामा थे शामा. भाव इतने बलवान होते हैं कि प्रारब्ध को भी छल देते हैं. यह शामा का जीवन जानने से समझ में आता है.
इसी तरह दाभोलकर के मन में भाव उत्पन्न हुआ कि बाबा की लीलाएँ और उनके माध्यम से बाबा का चरित्र लोगों तक पहुंचना चाहिए तो बाबा ने उनके भावों का मान रखा और आज उन्हीं दाभोलकर के लिखे श्री साई सच्चरित्र को पूरी दुनिया में लाखों लोग रोज़ पढ़ते हैं और उसमें बाबा के व्यक्तित्व के सजीव चित्रण से स्वयं को धन्य पाते हैं. दाभोलकर के भावों के चलते ही बाबा ने उन्हें यह आश्वासन दिया था कि यदि दाभोलकर अनन्य भाव से अपना अहंकार छोड़कर बाबा की शरण में आयेंगे तब बाबा उनके माध्यम से स्वयं अपना चरित्र लिखेंगे. अहंकार भी भाव है लेकिन बाकी सारे भावों को प्रदूषित कर देता है. बाबा ने अपना वचन निभाया और आज दाभोलकर को वेदव्यास के समकक्ष पूजनीय बना दिया है. भाव तो कतरे को भी समन्दर कर देते हैं.
भाव कैसे फलीभूत होते हैं? जब भक्ति भाव अपने चरम पर पहुँच जाता है और जब चहुँओर, हर किसी में अपने इष्ट का स्वरुप ही दिखता है तो मन में सेवा भाव का उदय होने लगता है. भाव अब प्रीति की सीढ़ी चढ़कर सेवा की सीढ़ी पर चढ़ कर बदलने लगते हैं. अब साई किसी मंदिर में, मूर्ति में, चित्र में, छवि में, किसी स्थान विशेष में सीमित न होकर पानी की फुहार की तरह सभी दिशाओं में फैल जाते हैं. भाव अब अपने साई के प्रति न रह कर हर मनुष्य में मौजूद साई की ओर खिंचने लगते हैं. भाव का स्वरुप बदल जाता है. अब साई एक न होकर अनेक हो जाते हैं. मेरे अन्दर भी साई होते हैं तो सभी के अन्दर भी साई होते हैं. यह भावना इस भाव से बनती है. क्या जड़ और क्या चेतन? सभी में साई ही तो है. सभी का आदर, सभी को सम्मान. सभी को प्रेम और सभी से प्रेम. भाव अब फल देने लगते हैं.

भावों के फलीभूत होने की अकेली सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है उनका निर्दोष होना. मन में मैल यानि गंदगी भरी होगी तो मलिन भाव उत्पन्न होंगे और मलिन भावों में किसी का भी भला नहीं छिपा होता. भाव में अगर स्वार्थ भरा हो तो भावों का वज़न कम हो जाता है. स्वार्थ है तो साथ नहीं होता और साथ में स्वार्थ नहीं होता. स्वार्थ का वज़न बहुत होता है. रिश्तों में से स्वार्थ निकाल देने पर रिश्ते हलके हो जाते हैं. महत्त्वहीन. निस्वार्थ भाव से ही साई को पाया जा सकता है. जब मन दूसरों के सुख में सुखी और दूसरों के दुःख से दुखी होने लगे तो समझो अब सेवा भाव मज़बूत होने लगा है. जब दूसरों के दुःख से मन दुखी होने लगता है तो यही मन उस दुःख को दूर करने के प्रयास भी करने लगता है. जब हम दूसरों की आँखों से आंसूं पोंछते हैं, जब किसी रोते हुए के चेहरे पर मुस्कान लेकर आते हैं, किसी निर्धन का इलाज करवा देते हैं, किसी भूखे को रोटी देते हैं, बेसहारा को सहारा देते हैं तब हम साई को पा लेते हैं. उसी दुखी चेहरे पर मुस्कान में, उसकी आँखों के आंसुओं में, रोटी के उस टुकड़े में, सहारे के उस सुख में हमें अब साई दिखाई देने लगता है. साई मूर्ति से निकल कर मानो हमारे जीवन में सुगंध की तरह समा जाते हैं.
दूसरों की सेवा करने वालों को कभी अपने लिए दुआ मांगनी ही नहीं पड़ती. अपने लिए कुछ मांगने की ज़रुरत ही नहीं रहती. हाथ उठने से पहले ही दुआ क़ुबूल हो जाती है. साई को पाने के बाद अब किस और चीज़ की दुआ मांगोगे?
सुख, शांति और आनंद के रूप में हमें साई मिल जाते हैं. जैसा रूप हमारे मन का होता साई उसी रूप में ढल जाते हैं. वो कभी भी हमें दुखी नहीं होने देते. यही तो हम साई से चाहते भी हैं. जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे साई के मन का.
बाबा भली कर रहे।।

                      श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु। शुभं भवतु।

Thursday, 29 December 2016

समाधि मंदिर: जहां दु:ख भी सुखों में बदल जाते हैं



बाबा अन्तर्यामी थे। उन्हें पल-पल के भविष्य की खबर रहती थी। वे देखते थे कि उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोग उनके संग रहकर कितने खुश हैं। उन्हें यह भी लगता होगा कि जब वो यह नश्वर शरीर त्यागेंगे, तब उनके भक्तों पर क्या बीतेगी? लोग मायूस हो जाएंगे। बाबा को इसीलिए तभी शिर्डी में वाड़ा बनवाने का विचार आया। एक ऐसा स्थल, जो उनके ‘ब्रहमांड में अंतरध्यान’ होने के बाद भी लोगों की सोच को सकारात्मक बनाए रखे। बुराइयों और बीमारियों से लड़ने के लिए उनका हौसला बरकरार रखे।



आज शिर्डी स्थित बाबा की समाधि पर दुनियाभर से लोग पहुंचते हैं। कुछ दु:खी होते हैं, तो कई अपना सुख बाबा से साझा करने आते हैं। जो किसी परेशानी या बीमारी से पीड़ित होते हैं, जब वे वापस शिर्डी से लौटते हैं, तो उनके अंदर एक नई ऊर्जा-शक्ति का संचार हो जाता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए एक दिन बाबा ने एक साथ दो लोगों को स्वप्न में आकर शिर्डी में एक वाड़े के निर्माण की प्रेरणा दी। बाबा नागपुर शहर के अपने भक्त बापूसाहेब बूटी उर्फ मुकुंद राव बूटी के स्वप्न में इसलिए आए, क्योंकि वे पैसों से सक्षम और समृद्ध थे। बाबा चाहते थे कि उनके जीवन से जुड़ा हर व्यक्ति अपने तन-मन-धन का सदुपयोग करे। लोगों की भलाई के बारे में सोचे। जो लोग अपनी किसी सफलता या अच्छाई से पैदा हुई खुशी बाबा से साझा करते हैं, तब उन्हें एक नई सीख मिलती है कि अगर ईश्वर ने आपको सुख-समृद्ध बनाया है, तो उसका सदुपयोग जरूरतमंदों के हित में करें। गरीब-मजबूर लोगों के दु:ख दूर करेंगे, सुख बांटेंगे, तो ईश्वर स्वत: प्रसन्न होगा। बापूसाहेब बूटी भी ऐसे ही एक परोपकारी व्यक्ति थे।

बाबा ने बापूसाहेब बूटी के साथ शामा को भी यही स्वप्न दिया। दरअसल, हर इंसान का अपना एक वजूद होता है, कार्य करने की क्षमता होती है। किसी के पास पैसा होता है, तो शारीरिक तौर पर कार्य करने की क्षमता रखता है। शामा बाबा की सेवा में लगा रहता था और साथ ही में उसे बाबा के प्रति मित्रवत भाव भी था। उसके जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य रहता था कि बाबा उसे जो आदेश दें, उसे पूरी शिद्दत से पूरा करना। उसके लिए जीवन में यही पुण्य कमाने का एक बेहतर जरिया था।

शामा को भी यह स्वप्न हुआ कि यहां एक वाड़े का निर्माण कराओ। बाबा ने स्वप्न में उससे कहा- ‘मैं यहां से अपने समस्त भक्तों की इच्छाएं पूरी करुंगा। हम यहां पर सभी साथ रहेंगे, खूब मिलेंगे, खूब नाचेंगे, खूब आनंद करेंगे।‘

बाबा को अपने स्वप्न में पाकर शामा विचलित हो उठा। भावविभोरता में उसकी आंखें भर आईं। वो तो हमेशा इसी प्रयास में लगा रहता कि बाबा कोई तो उसे आदेश दें। कुछ ऐसा करने को दें, जो उसके जीवन को सफल बना दे। लेकिन बाबा ने ऐसा आदेश क्यों दिया?

दोनों, शामा और बापूसाहेब बूटी, अच्छे से जानते थे कि बाबा निरुद्देश्य कोई आदेश-निर्देश नहीं देते। उनके शब्दों में गूढ़ रहस्य छुपे होते हैं, जिनका अंदाजा सिर्फ भविष्य में पता चलता है। उनकी कोई भी, किसी भी स्वरुप में की हुई बात कभी भी थोथी-पोची नहीं होती। गुत्थी को सुलझाने के लिए शामा और बापू साहब ने बाबा से इस स्वप्न का जिक्र किया। बाबा मुस्करा दिए। दोनों ने बाबा से वाड़े के निर्माण की अज्ञा मांगी। बाबा ने एक दिन शामा को नारियल दिया। कोई मुहूर्त्त और चौघड़िया नहीं। शुभ संकल्प में सभी गृह-नक्षत्र ठीक हो जाते हैं। खुशी-खुशी उस जगह पर वाड़े का भूमिपूजन किया, जहां पर बाबा ने स्वयं कई सालों तक अपने हाथों से पौधों को सींच-सींचकर खूबसूरत फूलवारी का रूप दिया था। यह जगह मस्जिद के पीछे थी और बूटी ने उसे मोल ले लिया था।


दरअसल, बाबा जब भी कभी रहाता जाते, तो वहां से जाई-जूही और न जाने कितने ही पौधे साथ लेकर आते। उन्हें बड़े प्यार से रोंपते। वामन तात्या नाम का एक कुम्हार था। वह बाबा को अपनी श्रद्धा-भक्ति से दो कच्चे घड़े दिया करता था। बाबा इन्हीं कच्चे घड़ों से पौधे सींचते। इस तरह वहां एक सुंदर फुलवारी का निर्माण हो गया। इसी जगह पर बापूसाहेब बूटी ने दगड़ीवाड़े का निर्माण कराया। दगड़ीवाड़ा यानि पत्थर से बना वाड़ा। उसी जगह अब भी बाबा अपने भक्तों के सुखों को सींचते हैं। यहीं पर साई की समाधि के स्पर्श भर से दुःख की कलियाँ सुख की सुवास में बदल जाती है।


आज इस जगह पर बाबा विश्राम कर रहे हैं। जिसे हम लोग समाधि मंदिर के नाम से जानते हैं। शिर्डी में दुनियाभर से लोग आते हैं। वे बाबा की समाधि में माथ टेककर, झोली फैलाकर, अंजुली फैलाकर, फूल चढ़ाकर और कुछ न हो तो दो आंसू गिरा कर दुआएं मांगते हैं। यहां जो आया, वो खाली हाथ नहीं गया। उस फकीर ने हमारी झोली हमेशा भरी।

बाबा यही चाहते थे कि उनके समाधीस्थ होने के बाद लोग अच्छाई और सच्चाई के मार्ग से भटके नहीं। दीन-दुखियों की मदद करने में पीछे न हटें। उन्हें सही मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहे। बाबा मुकुंदराव बूटी को प्यार से बूटिया कहा करते थे। बाबा ने उनके जरिये लोगों की मदद का एक रास्ता निकाला। मुकुंदराव ने भी अपने धन का इस तरह सदुपयोग किया। जो शामा बाबा के सशरीर रहते हुए उनके भक्तों को बाबा के पास ले आता और अपनी बात मनवा लेता, उसी शामा के प्रयासों से आज बाबा की समाधि हम सभी के चेहरों पर मुस्कान लेकर आती है।


बाबा भली कर रहे..