Thursday, 18 August 2016

साई बदल डालते हैं..

सुमीत पोंदा ‘भाईजी’
[लेखक श्री साई अमृत कथा के माध्यम हैं]


शास्त्रों में वर्णित गुरु गीतामें की गई व्याख्या से गुरुशब्द को समझने की कोशिश करते हैं. गुरु – इस शब्द को हम विभक्त कर दें तो गुऔर रुहमें मिलते हैं. गुका अर्थ होता है अन्धकारऔर रुका अर्थ, दूर करना. इस प्रकार से गुरुका अर्थ हुआअंधकार को दूर करने वाला.
आज तो गुर द्वारा दीक्षित किये जाने के मायने बदल गये हैं पर यदि गुरु द्वारा दी जाने वाली दीक्षा का शाब्दिक अर्थ भी समझें तो गुरु के मायने और भी स्पष्ट हो जाते हैं. दीका अर्थ है, दाग (मैल) और क्षा’’ प्रयुक्त होता है, क्षय करने की क्रिया के लिए. इस प्रकार दीक्षाका अर्थ होता हैदागों का क्षय करना. सरल भाषा में, गुरु द्वारा दीक्षित किये जाने अर्थ होता है, गुरु द्वारा हमारे (मन का) मैल दूर करने की क्रिया. इसी तरह से, गुरु के प्रकारों में समर्थ सद्गुरु को गुरुता का सर्वोच्च स्तर माना गया है. साई समर्थ सद्गुरु हैं.

बहुत आसान होता है यह कहना कि मनुष्य यदि काम, क्रोध, लोभ, मत्सर, मोह के पाश से मुक्त हो जाए तो वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो जाता है लेकिन दैनिक कार्यों में लग कर, गृहस्थाश्रम में रह कर यह कतई संभव नहीं होता है कि हम सब मन के इन विकारों से छुटकारा पा लें. इन्हें बलात् छोड़ने की कोशिश भी परेशान कर देने वाली होती है और जब तमाम कोशिशों के बावजूद इन विकारों से छूट नहीं पाते तो मन में हताशा का भाव पैदा होने लगता है. अपनी कमतरी का अहसास होने लगता है. अपने कर्म में अभाव महसूस होने लगता है.     

साई बाबा को समर्थ सद्गुरु माना गया है. वे सही मायनों में समर्थ सद्गुरु हैं भी. साई के संपर्क में जो भी आया, साई ने उसके दुर्गुणों का नाश न करते हुए, उनके स्वरुप को ही बदल डाला. साई का संसर्ग होने पर रोम-रोम हर्षित हो उठता है, मन में प्रसन्नता का भाव जाग्रत हो उठता है, शरीर में एक विद्युत-सा प्रवाह अनुभव करते हैं, साई के चरणों से प्रीति का अनुभव होता है और अपने सारे दुर्गुणों का सहज ही आभास होने लगता है. दुर्गुणों का आभास होने पर उनका दमन करने की इच्छा जाग उठती है. बदलाव की इच्छा जाग्रत होने लगती है और बदलने की इच्छा का उदय ही बदलाव की ओर पहला कदम होता है. साई की भक्ति इतने मानुषिक भाव जगा देती है कि जन्म-जन्मों के कर्मों के प्रभाव से निर्मित हमारा स्वभाव और उनके विकार शैने-शैने क्षीण होने लगते हैं. साई में प्रीति हमारे दुर्गुणों का इलाज करते हुए उन्हें सद्गुणों में बदल डालती है. हमारी आँखों के रास्ते हमारे सारे दुर्गुण पानी बनकर बह जाते हैं. हम सहज भाव से अपने दुश्मन को भी माफ कर देते हैं, लालच से पार पाते हैं, अहंकार से ऊपर उठ पाते हैं.... यकायक हमें यह लगने लगता हैं कि साई ने हमें नवाज़ दिया है; उसने हमें वो सब तो दिया ही जो हम मांगने आये थे पर उसने उससे कहीं अधिक भी दे दिया है. वो सब भी जो हमने तो माँगा ही नहीं था.

ऐसे ही बाबा ने असंख्य भक्तों को अपने आशीष से पार लगा दिया है और उनके अंदर परोपकार की भावना प्रबल कर दी है. वे ऐसा लगातार कर रहे हैं और करते ही रहते हैं. शिरडी में उनका पहला और ज्ञात चमत्कार उनकी इसी विधा को सुस्पष्ट करता है जब उन्हे शिरडी के बनियों द्वारा मस्जिद में दीप जलाने के लिए तेल देने से मना कर दिया गया था (अ. ५) और उन्होंने मस्जिद के जल को तेल में परिवर्तित करके दीप जलाये थे. यह चमत्कार देखकर बनियों के दिल में दर बैठ गया कि अब तो वे इस फकीर के श्राप से नहीं बच सकते परन्तु बाबा ने उनको न सिर्फ माफ कर दिया बल्कि उन्हें यह ज्ञान भी दिया कि झूठ बोलकर तेल नहीं देने से उन्होनें किस प्रकार ईश्वर से झूठ बोला है वरन मानवता की दृष्टि से भी वे किस प्रकार से दोषी हैं. यह सुनकर बनिए बाबा के चरण में गिर पड़े. उनमें आतंरिक सुधार हो रहा था.

साई सच्चरित्र के अध्ययन में एक प्रसंग (अ. ४९) आता है जब नाना चांदोरकर, बाबा के दर्शन को आयी एक मुस्लिम महिला की सुंदरता से सम्मोहित हो उठते हैं और अपने मन में उठते विचारों से ग्लानी महसूस करने लगते हैं. तब बाबा उनके विचारों को जान कर उनके घुटने पर एक थपकी लगा कर उन्हें यह कहते हैं कि ईश्वर कि बनाए हुई हर वस्तु में सुंदरता के दर्शन करना कतई बुरा नहीं है. जिस ईश्वर की निर्मित सृष्टि इतनी सुन्दर है, वह स्वयं कितना सुन्दर होगा! इस भाव से सृष्टि को देखेंगे तो उस परम-पिता की सुंदरता हमारे मन में बस जायेगी. सुंदरता से प्रभावित होना बुरा नहीं है, बुरा है उससे अहितकारी विचारों का पनपना. नाना को सहज ही अपनी गलती का अहसास हो गया और उसके मन से मैल साफ़ हो गया.

साई सच्चरित्र में कई स्थान पर बाबा के क्रोध का और उनके क्रोधित हो जाने का उल्लेख भी आता है. संतों का क्रोधित होना कोई असामान्य बात नहीं है. हमारे शास्त्रों में लिखा गया है कि जो भी संतों के क्रोध का पात्र बन गया, उसका जीवन तर गया. बाबा का क्रोध जिद:क्रोध कि श्रेणी में आता है. ऐसा क्रोध, जिसका कारण सामान्यजन की समझ में नहीं आता. इस प्रकार का क्रोध, लोगों में सुधार लाने के लिए होता है न कि मन कि हताशा या अप्रसन्नता प्रकट करने के लिए. जितनी जल्दी बाबा को क्रोध आता था, वह उतनी ही जल्दी सामान्य भी हो जाते थे. आमतौर पर बाबा के अनन्य भक्त इस प्रकार के क्रोध को सामान्य मानते थे परन्तु यदि किसी को उनके क्रोध से दु:ख होता था तो बाबा स्वयं उसे मनाते थे जैसा उन्होंने तात्या (अ. ६) के साथ किया जब मस्जिद में किये जा रहे, उनकी इच्छा के विपरीत, सुधारों के चलते, बाबा क्रोधित हो गए थे और उन्होंने किये जा रहे कार्यों को तोड़ दिया था. तात्या की पगड़ी को जलती अग्नि में फ़ेंक दिया था. तात्या इस पर भी शांत बने रहे और मस्जिद के कार्यों में लगे रहे. यह बाबा की भक्ति का ही प्रताप था. क्रोध शांत होने पर बाबा ने स्वयं एक नया साफा मंगवाकर तात्या के सर अपने हाथों से नयी पगड़ी बाँधी.

जब अन्नासाहेब दाभोलकर, जो गुरु की महत्ता को नकारते हुए बाबा के दर्शनों को आये थे और अल्प-शिक्षित होते हुए भी उच्च पदों पर आसीन होने के चलते अहंकार से भरे हुए थे, को यह प्रेरणा हुई (अ. २) कि बाबा जैसे चमत्कारी संत की लीलाओं को लिखा जाना चाहिए, तब शामा के अनुरोध पर उनकी इच्छा स्वीकृत हुई पर इस शर्त के साथ कि अन्नासाहेब को अपना अहंकार छोड़ कर बाबा की शरण में आना होगा. तब बाबा दाभोलकरजी को माध्यम बनाकर स्वयं अपनी जीवनी लिखेंगे. बाबा ने यही किया भी. साई की लीलाओं का श्रवण करने-मात्र से उनके भक्तों के दु:ख दूर हो जाते हैं. दाभोलकर के माध्यम से साई द्वारा लिखी गई जीवनी, साई सच्चरित्र, आज दुनिया में सबसे अधिक मात्र में पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ हो गया है. एक अनुमान के मुताबिक आज इस ग्रन्थ की, दुनिया की विभिन्न भाषाओँ में, सालाना लगभग ५ लाख प्रतियाँ भक्तों द्वारा पढ़ी जाती हैं.

बाबा की कीर्ति को सम्पूर्ण महाराष्ट्र में फैलाने का श्रेय गणपतराव सहस्त्रबुद्धधे यानि दासगणु महाराज को जाता है. दासगणु बाबा शरण में आने से पूर्व पुलिस महकमे में बहुत छोटे पद पर स्थापित थे, गाने के शौक़ीन और द्विअर्थी संवादों से लबालब मराठी नाटक मंडलियों के तमाशे देखने के शौक़ीन भी थे. नानासाहेब चांदोरकर ने उन्हें बाबा से मिलवाया था. बाबा का आदेश हुआ कि अब उन्हें ईश्वर की सेवा में लग जाना चाहिए. नहीं माने. कुछ समय तक बाबा ने उन्हें अपनी लीलाएं रच कर इस ओर संकेत भी दिया. बाबा के कई सारे इशारों के बाद गणपतराव ईश्वर-भक्ति की ओर मुड ही गए और संतों पर, भक्ति पर अद्भुत काव्य संग्रह की रचना की. दासगणु के नाम से प्रचलित हुए. एक बार जब वे (अ. १५) बन-ठन कर चमकदार अंगरखा, जूते, गले में माला पहने कीर्तन करने को जा रहे थे तब बाबा ने उन्हें ताना मारकर कहा कि इतना सज-धज, दूल्हा बनकर वे कहाँ जा रहे हैं. ईश्वर-भक्ति में यह सब शोभा नहीं देता. उस दिन से दासगणु महाराज ने केवल अधोवस्त्र में, हाथ में करताल लिए कीर्तन करना प्रारम्भ कर दिया. कितना सार्थक तरीका था बाबा का यह बताने का कि दिखावट, इश्वर-प्राप्ति में बाधक होती है. समय आने पर बाबा ने दासगणु की ईशोपनिषद सम्बन्धी गुत्थी का समाधान काकासाहेब दीक्षित की नौकरानी नाम्या कि बहन, मलकरणी, के माध्यम से करवाया.

विपरीत समय में मन का संयम रखने के सम्बन्ध में बाबा ने स्वयं का उदाहरण उद्धत किया है कि उनके गुरु ने उन्हें (अ. ३२) चार-पांच घंटे तक एक कुएँ के ऊपर लटका रखा था और वे इसमें परम आनंद का अनुभव कर रहे थे. क्या ऐसे समय में कोई परम आनंद का अनुभव कर सकता हैं? जब ईश्वर हमें परीक्षा के दौर से पसार कर रहा होता है तब हमारा विश्वास टिके रहना चाहिए तभी हम उसकी कृपा पा सकते हैं.  

भगवत-प्राप्ति में धन-संग्रह की प्रवृत्ति बाधक होती है, यह बाबा ने गोचर किया जब एक व्यापारी उनसे (अ. १६-१७) ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति करने गया. इस कथा में बाबा ने स्पष्ट किया हैं कि जब तक मनुष्य का ध्यान धन में ही लगा रहेगा और जब तक धन-संग्रह ही उसका ध्यान-बिंदु रहेगा, तब तक ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है. वर्तमान समय में चेन्नै के सोफ्टवेयर कंपनी के मालिक, श्री के. वी. रमणी, को बाबा ने प्रेरणा दी और उन्होंने अपना कारोबार समेट कर समस्त धन-प्राप्ति बाबा की सेवा में लगा दी और १११ करोड़ रुपयों से शिरडी में एक समय में एक साथ १४००० भक्तों के आवास की सुविधा बनवा दी. ऐसा वैराग्य साई की प्रेरणा से ही संभव है.

बाबा के भक्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि से परिपूर्ण होते हैं. काम में शास्त्रोक्त रूप से ही लिप्त होते हैं. क्रोध करते हैं मगर अपनी अक्षमताओं पर. लोभ रखते हैं मगर साई के चरणों का. मोह रहता है साई की लीलाओं को सुनने का. मद रहता है मगर साई के गुण-गान का और इर्ष्या (मत्सर) रहती है, अपनी चारित्रिक कमियों से.


साई बदल डालते हैं..

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभम भवतु..

Wednesday, 17 August 2016

साई बाबा का छठा वचन


मेरी शरण आ ख़ाली जाए, हो तो कोई मुझे बताये
[Copyrighted article. This article is covered under the intellectual rights. Any part or content of this article must not be reproduced with out the written consent of Shri Sumeet Ponda. सर्वाधिकार सुरक्षित. यह लेख श्री साई अमृत कथा और श्री सुमीत पोंदा 'भाईजी' की निजी निधि है. इसे या इसके किशी भी अंश को निधिधारी की लिखित अनुमति के बिना उपयोग किया जाना दंडनीय अपराध होगा.]                                         
श्री साई अमृत कथा में बाबा के 11 वचनों में से छठे वचन के बारे में बताते हुएभाईजीसुमीतभाई पोंदा कहते हैं कि बाबा का यह छठा वचन मेरी शरण ख़ाली जाए, हो तो कोई मुझे बताये साई के शरणागत को साई की महिमा के बारे में बताता है. यह कि उनकी शरण में आने वाला कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटता. साई का यह वचन एक प्रकार से साई के विराट चरित्र को उजागर भी करता है जिसमें साई में भरोसा रखने वाले को साई ने इस बात की छूट भी दी है कि वो साई की शरण में जाने के बाद अगर मन की मुराद नहीं पाता तो इस बात की फ़रियाद साई से कर सकता है. इसी तरह, इस वचन को सुनने वाले के मन में साई के सर्वशक्तिमान राजाधिराज स्वरुप का उदय होता है. मानो कोई राजा अपनी प्रजा से कह रहा है कि तुम मेरी शरण में आ जाने के बाद ख़ाली कभी नहीं जा सकते.
दूसरी तरफ़ इस वचन में साई की करुणा भी उजागर होती है जिसमें वो बड़े ही प्रेम से इच्छा करने वाले को यह भी कहते समझ में आते हैं कि अगर उनकी शरण में आकर कोई अपने मन की नहीं पा सका है तो वह ज़रूर अपने साई से इस बात की फ़रियाद भी कर सकता है.
इस वचन को समझने के लिए समझना होगा कि साई की शरण क्या है? उनकी शरण पाने के लिए एक भक्त में क्या योग्यता होनी चाहिए? शरण में जाकर भक्त को क्या साई से मिल जाता है? मन का नहीं मिल पाने पर कोई भी भक्त साई से क्या फ़रियाद कर सकता है?
शरण में आने की शुरुआत चरणों से होती है और भक्ति की पहली सीढ़ी याचना बनती है.

 याचना में इच्छाएं छिपी होती है. पहले-पहल हम साई के समक्ष याचक बन कर ही तो आते हैं. उनसे चमत्कारों की उम्मीद रखते हैं. यहीँ से साई से हमारे प्यार-भरे रिश्ते की शुरुआत होती है. जीवन के इम्तिहान में जो पर्चा हमारी समझ में नहीं आता है, उसका हल मांगने हम साई के पास पहुँचते हैं. मांगते हैं और इतनी तीव्रता से मांगते हैं कि साई करुणावश हमें वो दे देते हैं जो हम उससे चाहते हैं. लोभ और मोह में फंस कर हम साई से सुख के आवरण में दुःख मांग लेते हैं. आज जो सुख समझ में आता है वो कल का दुःख ही होगा क्योंकि हम साई से सभी कुछ वही मांगते हैं जो नाशवान हैं. वस्तु को आज पाना और कल उसका नाश दुखी ही करता है. साई देना कुछ और चाहते हैं लेकिन रुक जाते हैं क्योंकि हमें तैयार नहीं पाते हैं. उसका भण्डार तो अमूल्य वस्तुओं और अहसासों से लबरेज़ हैं लेकिन हम ही निरर्थक चीज़ें उससे मांगते रहते हैं तभी हम पाकर और मांगते हैं. साई और भी दे देते है. मांगने का और पाने का यह सिलसिला चलता ही रहता है जब तक हम मांगते-मांगते शर्मिंदा नहीं हो जाते. वो हमारी मांगने की आदत से दुखी भी हो जाता है..वो तो दातार है. देना बंद ही नहीं करता. लेकिन इस पूरे क्रम में वो हमें सुधारता, संवारता चलता है.
[Copyrighted article. This article is covered under the intellectual rights. Any part or content of this article must not be reproduced with out the written consent of Shri Sumeet Ponda. सर्वाधिकार सुरक्षित. यह लेख श्री साई अमृत कथा और श्री सुमीत पोंदा 'भाईजी' की निजी निधि है. इसे या इसके किशी भी अंश को निधिधारी की लिखित अनुमति के बिना उपयोग किया जाना दंडनीय अपराध होगा.]                            जब हमारे पास अपनी ही ज़िद और साई की कृपा से नाशवान चीज़ों का अम्बार लग जाता है तो उनके खो जाने का डर भी मन में बैठ जाता है. तब साई हमें वो देना शुरू करता है जो वो हमेशा से ही हमें देना चाहता था. अब उसका काम शुरू होता है.

वो हमारे ही मांगे हुए दुःख का अहसास मिटाने लगता है. हमारे कर्मों की गति के अनुसार हम पर दुःख तो पड़ता है लेकिन हम दुखी नहीं होते. हमें दुःख प्रभावित नहीं करता. हम संवर रहे होते हैं. दुःख के अहसास के मिटने के बाद साई की कृपा से हमें सुख के पंख लग तो जाते हैं लेकिन अब हम बेलौस उड़ने नहीं लगते. संवरने से जीवन में संतुलन आ जाता है. स्थायित्व आ जाता है. साई के सही स्वरुप की पहचान होने लगती है. विश्वास होने लगता है कि जो साई कर रहे हैं वो हमारे भले का ही तो है.   
साई अनंतता का स्वरुप हैं. हर कण में, हर मन में, हर जीवन में, नभ-तल में साई हैं. यूं कहें कि यह सभी कुछ जो अस्तित्व में है, वह सभी कुछ साई में है या प्रत्येक विद्यमान जड़ और चेतन वस्तु में साई समाया हुआ है. बात एक ही है. साई परम सत्ता हैं. सर्वव्यापी हैं. सर्वज्ञाता हैं. सर्वशक्तिमान हैं. सर्वज्ञ साई हैं या साई सर्वज्ञ हैं इसमें भेद कर पाना मुश्किल है.
साई की शरण पाने के लिए या उसमें समाने के लिए किसी को कोई विशेष जतन या प्रयत्न नहीं करना पड़ता. किसी विशेष स्थान पर जाने की आवश्यकता भी नहीं है. अनुष्ठान करने, आहुति देने की भी कोई ज़रुरत नहीं होती है.
साई की शरण पाने के लिए भक्त को किसी प्रकार की विशेष योग्यता भी प्राप्त नहीं करनी होती. कोई पोथी या पुराण का अध्ययन नहीं करना है. कोई मंत्र नहीं रटना है और न ही कोई तंत्र साधना है. न कोई विशेष वस्त्र धारण करने हैं और न ही कोई भूषा. कोई हार-फूल, अगरबत्ती, चादर या फिर कोई भी महंगी वस्तु नहीं चढ़ानी है! कुछ भी साई को दरकार नहीं है. जो हमें देता है, उसे हम लौटा ही क्या सकते हैं? ये तो सोचना भी बेईमानी हुई. उसी का तो सब दिया हुआ है और इन चीज़ों से हमारा रिश्ता तभी तक है जब तक उसका दिया हुआ यह शरीर है. शरीर नाशवान है और उसके सारे रिश्ते भी. यही शाश्वत सत्य भी है. साई तो अजर-अमर हैं और उनका-हमारा साथ भी. इस साथ को बाँधने के लिए तो कोई भी नाशवान सेतु नहीं बन सकती.    
साई की शरण को पाने के लिए नाम रटन करने जैसी भी कोई साधारण क्रिया नहीं करनी होती. जीभ और होंठ को हिलाना भी नहीं है. सिर्फ़ साफ़ मन से साई का स्मरण मात्र कर लो. वही काफ़ी है. मन साफ़ है और साई में पूर्ण विश्वास है तो साई अपनी शरण में ले लेते हैं. पर मन साफ़ कैसे होगा?
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याचना से शुरू हुई भक्ति का चरम प्रेम है. जब साई के बिना, उनकी बातों के बिना, उनके दर्शन किये बिना जो अधूरापन लगे और जब वही अधूरापन पूरा भी लगने लगे तो समझो साई से प्रेम हो गया है. इस प्रेम को समझने के लिए मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम समझना होगा. प्रेम में तो विष को अमृत में बदलने की शक्ति होती है.
साई तो प्रेमी हैं ही. अनंत प्रेमी. उनके मन में हमारे लिए अकूत प्रेम का झरना सतत बहता ही रहता है. इस अनंत झरने में डूब कर ही हम अपने आप को साईमय बना लेते हैं. साई में और हम में कोई भेद नहीं रहता. साई की शरण में जाना, उनसे एकाकार हो जाने जैसा ही है. अनंत प्रेम. जब प्रेम अनंत हो जाता है तो रोम-रोम संत हो जाता है. साई का सान्निध्य पाकर हम भी संत हो जाते हैं. प्रेम में प्रेमी जैसा हो जाना सरल भाव है. हमारे रोम-रोम में भी संतत्व का भाव हिलोरे मारने लगता है. ये हमारा बदन मंदिर बन जाता है. साई का मंदिर..जिसमें सदैव साई की ज्योत साई के आगे प्रज्ज्वलित रहती है. अनुपम, अखंड ज्योत. अपने गुरु के प्रति अनंत प्रेम की ऐसी ही ज्योत से साई ने द्वारकामाई में वो धूनी जलाई होगी जो आज भी मानवता का कल्याण करती है. जब रोम-रोम संत हो जाता है, हमारा बदन मंदिर बन जाता है तब हमारा हृदय मन से महंत हो जाता है. साई से विलक्षण प्रेम ही उनकी शरण है. हमारे उद्धार का रास्ता खुलने लगता है.
साई से प्रेम कर और बदले में उनका प्रेम प्राप्त कर कोई भी कभी ख़ाली नहीं रहता. झोलियाँ इतनी भर जाती हैं कि छोटी पड़ने लगती हैं. हाथ उठते बाद में हैं और दुआएं क़ुबूल पहले हो जाती हैं. सजदा में झुका बाद में जाता है, बरकत पहले हो जाती है. साई की करामात है ही ऐसी. उन्हें किसी को ख़ाली हाथ लौटाना आता ही नहीं है.
साई की शरण में नाशवान चीज़ों का मोह सिमट जाता है. उनकी निरर्थकता समझ में आने लगती है. उनमें आसक्ति मिटने लगती है. वासना की आग ठंडी पड़ने लगती है. मोह साई में बन जाता है. साई की शरण सुखकारी लगने लगती है. प्रेम का अर्थ समझ में आने लगता है. आसक्ति का स्वरुप बदल जाता है. आसक्ति अब साई शरण की हो जाती है. उनके बिना चैन नहीं मिलता. मन में साई नाम का रटन बराबर चलता रहता है. साई सदा साथ रहते हैं. मोह आनंद में बदल जाता है. साई के साथ का आनंद.
भविष्य अनिश्चित होता है इसीलिए उसका भय हमेशा हमें सताता ही रहता है. अनिश्चितता की कोख से डर का जन्म होता है. भय का दूसरा अर्थ मृत्यु है. भयभीत व्यक्ति मृत के समान होता है. साई के साथ से भविष्य का यह भय भी मिट जाता है. साई नाम से मन में अभयत्व का भाव जागृत हो उठता है. कोई मेरा बुरा नहीं कर सकता! यह भाव मन में जगह बनाने लगते हैं. निर्भयता का उदय होने लगता है. अनिश्चितता के भंवर में साई के साथ से अभय का कमल खिल उठता है.
साई की शरण मन के भाव बदल देती है. हम जब उसकी शरण में आते हैं तो रिक्तता लेकर आते हैं, याचक बन कर आते हैं लेकिन साई इस रिक्तता में सुख, शांति और आनंद का भाव भर देते हैं. कोई कहे तो सही कि साई की शरण से वो ख़ाली लौटा है. साई ने कभी किसी को ख़ाली नहीं लौटाया.

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बाबा भली कर रहे।।

                    श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु।                                                     www.saiamritkatha.com

Saturday, 9 July 2016

गुरु पूर्णिमा पर साई को नमन

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हमारी संस्कृति में हर एक उत्सव मनाये जाने का एक निश्चित कारण होता है. लेकिन हम तो इसे महज रिवाज़ मानकर मना लेते हैं क्योंकि हमें इन कारणों के बारे में पता ही नहीं होता. शायद किसी ने बताया भी नहीं होता. गुरु पूर्णिमा गुरु का उत्सव है और बहुत सटीक है कि गुरु का यह उत्सव चंद्रमा की कलाओं और उसकी शीतलता के साथ जोड़ कर मनाया जाता है.
हम सभी जानते हैं कि चंद्रमा हमारी पृथ्वी का सबसे करीबी उपग्रह है. इसकी अपनी कोई रौशनी नहीं होती है. इसकी जो भी चमक है वह सूर्य के कारण है. पृथ्वी के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते-लगाते जब भी चंद्रमा सूर्य से विमुख हो जाता है तो कृष्ण पक्ष या अंधियारा पखवाड़ा शुरू हो जाता है यानि उजाले से अँधेरे की ओर चंद्रमा की यात्रा शुरू हो जाती है और इसके विपरीत जब चंद्रमा का मुख सूर्य की ओर हो जाता है तो यह अँधेरे से उजाले की ओर बढ़ना शुरू हो जाता है. इसे हम शुक्ल या उजियारा पक्ष कहते हैं. इसी तरह जब हम गुरु की ओर अपना मुंह कर लेते हैं तो हमारी भी अँधेरे से उजाले की यात्रा आरम्भ हो जाती है और जब हम गुरु पीठ कर लेते हैं तो हम अँधेरे की ओर बढ़ने लगते हैं. गुरु की ओर देखना तो हमें ही पड़ेगा. गुरु तो वहीँ रहता है. बस जब हम उसकी ओर जब देखते हैं तो वो हमें राह दिखाना शुरू कर देता है.
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एक और बात है जो गुरु के उत्सव को चंद्रमा से सीधे जोडती है. अंधेरे जब लम्बे होने लगते हैं तब गुरु की आवश्यकता अधिक लगने लगती है. सूर्य के दक्षिणायन, जब दिन छोटे होने लगते हैं और रात की लम्बाई बढ़ने लगती है, होने के बाद आषाढ़ माह में गुरु पूर्णिमा पहली पूर्णिमा होती है. पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सारी कलाएं बिखेरता है. सबसे ख़ूबसूरत होता है. प्रकाशवान होता है. गुरु तो अपने आप में प्रकाशित करने की क्रिया का ही नाम है. यही गुरु शब्द का अर्थ भी है.
पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा पानी है. चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण धरती पर पानी में हलचल पैदा कर देता है. पूर्णिमा की रात को जब चंद्रमा की लीला और उसकी रौशनी पूरी होती है तब उसकी शीतल चांदनी पृथ्वी पर समुद्र में हिलोरे पैदा करती है. समुद्र में ज्वार आ जाता है और उसके तले की गंदगी किनारे लग जाती है. तब साफ़ पानी वापस समुद्र में चला जाता है. हमारे शरीर में भी पानी का अंश अन्य चार तत्वों, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश से कहीं अधिक है. गुरु का दिया ज्ञान गुरु के गुरुत्वाकर्षण के चलते हमारे भौतिक आकार में हिलोरे पैदा करता है और हमारे मन की गंदगी को बाहर निकाल कर हमें साफ़ कर देता है. गुरु की सीख से उठ रही मन की हिलोरों के इसी ज्वार में हम एक कुशल नाविक की तरह अपने अन्दर की यात्रा शुरू कर देते हैं. ख़ुद की खोज प्रारम्भ हो जाती है. उस ख़ुद की जिसे हम जीवन की आपा-धापी में खो चुके होते हैं. गुरु पूर्णिमा उत्सव है उस यात्रा का जो हमें आध्यात्म की ओर ले जाती है, अपनी ओर ले जाती है.
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गुरु पूर्णिमा का पौराणिक महत्त्व भी है. इसी दिन कोई 15000 वर्ष पूर्व शिव ने हिमालय में 84 वर्षों तक अथक तपस्या के बाद विश्व के पहले, आदिगुरु, बन कर सप्तऋषियों को ज्ञान दिया था जिन्होंने इस ज्ञान को विश्व भर में फैलाया.
महर्षि वेदव्यास, जिन्हें विष्णु के 24 अवतारों में से एक माना जाता है, का जन्म इसी दिन ऋषि पाराशर और मछुआरे की बेटी सत्यवती के यहाँ हुआ था. उन्होंने न सिर्फ वेदों की पुनः रचना की बल्कि उन्हें चार भागों में उनकी शिक्षाओं के अनुसार व्यास रूप से बांटा भी. ये वेद अथर्ववेद, यजुर्वेद, सामवेद और ऋग्वेद कहलाये. वेदव्यास ने बाद में श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भगवद्गीता की रचना कर इस संसार को ज्ञान का अद्भुत भण्डार दिया. इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है.
इसी दिन बुद्ध ने भी ज्ञान-प्राप्ति के कोई 5 हफ़्तों बाद सारनाथ में अपना पहला उद्बोधन किया था. जैन समुदाय का चातुर्मास आज ही के दिन प्रारंभ होता है जब 24वे तीर्थंकर महावीर स्वामी ने कैवल्य की प्राप्ति के बाद एक गंधार, गौतम स्वामी को अपना शिष्य बनाया था.
शिष्य के बिना गुरु का औचित्य ही नहीं है और गुरु के बिना शिष्य का अस्तित्व. दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे के बिना दोनों ही अधूरे हैं. साथ ही यह बात अवश्य ही सत्य है कि जिस दिन शिष्य में शिष्यत्व का भाव उत्पन्न हो जाएगा उस दिन ईश्वर स्वयं सद्गुरू का रूप लेकर आ जायेंगे. शिष्यत्व के भाव से मतलब है कि जिस दिन हम अपने मनोभावों पर किसी को शासन करने की स्वीकृति इस आशय  से देंगे कि वो जीवन की कठिन राहों पर हमारा हाथ पकड़ कर चले. जब हमारे भाव शासित किये जाने के योग्य हो जायेंगे, उस दिन हमारे जीवन में गुरु का आना तय है.
[Copyrighted article. This article is covered under the intellectual rights. Any part or content of this article must not be reproduced with out the written consent of Shri Sumeet Ponda. सर्वाधिकार सुरक्षित. यह लेख श्री साई अमृत कथा और श्री सुमीत पोंदा 'भाईजी' की निजी निधि है. इसे या इसके किशी भी अंश को निधिधारी की लिखित अनुमति के बिना उपयोग किया जाना दंडनीय अपराध होगा.]
शिर्डी में गुरु पूर्णिमा उत्सव की शुरुआत
सोमवार का दिन. 13 जुलाई, 1908. बाबा ने मस्जिद में बैठे-बैठे शामा को बुला कर कहा कि जाओ और उस बुड्ढे से कहो कि सामने लगे खम्बे की पूजा करे. तात्यासाहेब नूलकर को बाबा प्रेम से बुड्ढा कहा करते थे. शामा को खम्बे की पूजा करने की बात समझ नहीं आई लेकिन बाबा की बात कभी थोथी-पोची होती नहीं थी और बाबा का हुक्म टालने का ज़ोर उनमें नहीं था. वो दौड़े-दौड़े दादा केलकर के पास गए जिन्हें थोडा-बहुत ज्योतिष और पंचांग का ज्ञान था. दादा केलकर ने पंचांग देखा और बताया कि उस दिन गुरु पूर्णिमा थी. गुरु पूर्णिमा पर क्या करना है इस बात का भान तो उन दोनों में से किसी को था नहीं लेकिन वे समझ गए कि इस अवसर पर बाबा की इच्छा है कि गुरु के रूप में उस खम्बे का पूजन किया जाए जिसने पूरी मस्जिद का भार अपने ऊपर ले रखा है. गुरु भी तो अपने शिष्य का भार अपने ऊपर ले कर रखता है

नूलकर आये और उन्होंने शामा से कहा कि बाबा के अतिरिक्त हम किसी और को क्यों पूजे जब साक्षात् समर्थ सद्गुरू साईनाथ हमारे मध्य मौजूद हैं. उन्होंने बाबा से इस बाबत अनुमति मांगी लेकिन बाबा ने नहीं दी. शामा के बहुत ज़िद करने पर बाबा ने अपनी पूजा करने की अनुमति दी. बाबा को धोती अर्पण की गयी और पहली बार बाबा की आरती नूलकर द्वारा उतारी गयी. इस तरह शिर्डी में गुरु पूर्णिमा उत्सव की शुरुआत हुई.
साई के ऊपर उनके गुरु की बहुत गहरी छाप थी. अपने गुरु के बारे में कभी उन्होंने स्पष्ट रूप से किसी को कभी बताया नहीं. श्री साई सच्चरित्र के अध्याय 18-19 में उल्लेख है कि खशाबा देशमुख की माँ राधाबाई देशमुख के बाबा से गुरुमंत्र प्राप्त करने ज़िद करने पर बाबा ने उन्हें बड़े ही प्रेम से यह समझाया था कि उनकी प्रणाली में गुरुमंत्र देने का कोई रिवाज़ है ही नहीं. उनके गुरु ने भी उन्हें कोई गुरुमंत्र नहीं दिया था बल्कि निष्ठा और धैर्य की दक्षिणा उनसे ली थी. बाबा ने अपने गुरु की 12 वर्षों तक अथक सेवा की और इसके बदले में गुरु की कृपादृष्टि से उन्हें जीवन का परम सुख मिला.
बाबा ने अपने गुरु से प्राप्त जीवन जीने के बहुमूल्य सूत्र श्रद्धा और सबुरी अपने भक्तों को भी दिए. साई बाबा का कहना था कि अपने गुरु में अटूट श्रद्धा रखने से और सबुरी (सब्र) रखने से जीवन के समस्त कष्ट दूर कर अंतिम ध्येय, ईश्वर से एकाकार, प्राप्त हो जाता है.

श्रद्धा मनुष्य में अभयत्व का संचार करती है. भय मृत्यु के समान होता है. अपने आराध्य में श्रद्धा कभी भी भयभीत नहीं होने देती. इसी श्रद्धा पर सवार होकर हम निडरता से अपना जीवन जी सकते हैं कि हमारा रखवाला जब सदा हमारे साथ ही है तो फिर कैसा डर? इसी तरह सबुरी हम में धैर्य का संचार करती है, हिम्मत देती है और आशा को जीवित रखती है. आशा ही जीवन का आधार है. यह सब्र रख कर ही हम सीख सकते हैं.
[Copyrighted article. This article is covered under the intellectual rights. Any part or content of this article must not be reproduced with out the written consent of Shri Sumeet Ponda. सर्वाधिकार सुरक्षित. यह लेख श्री साई अमृत कथा और श्री सुमीत पोंदा 'भाईजी' की निजी निधि है. इसे या इसके किशी भी अंश को निधिधारी की लिखित अनुमति के बिना उपयोग किया जाना दंडनीय अपराध होगा.]

साई के इन्ही सूत्रों से हम अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं. अगर इन सूत्रों को हमने अपने जीवन में समो लिया तो यही इस गुरु पूर्णिमा पर साई को हमारी सच्ची गुरु-दक्षिणा होगी.
बाबा भली कर रहे।।
                       श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु
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Wednesday, 6 July 2016

साई के साथ स्वभाव से स्वरुप की ओर



साई बाबा को उनके भक्त अलग-अलग स्वरूपों में पूजते हैं. कोई उन्हें निर्गुण, निराकर ईश्वर मानता तो कोई सगुण साकार भगवान्. कोई उन्हें संत के रूप में पूजता है तो कोई साधु मानता है तो कोई चमत्कारी अवतार. यह सभी धारणाएं आपस में कहीं नहीं मिलती. बिलकुल विरोधाभासी हैं. साई को तो जिसने जिस रूप में ध्याया, उसी रूप में पाया. ‘जया मनी जैसा भाव, तया तैसा अनुभव..’ यानि जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का. रामचरित मानस में तुलसीदासजी ने कहा भी तो है, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.” भाव में ही भगवान् बसते हैं.

साई के तमाम मानने वाले इस बात पर तो एकमत हो जाते हैं कि साई सद्गुरू हैं. गुरु या मुर्शिद का शीर्ष या सर्वोत्तम प्रकार. लेकिन साई तो एकदम अनोखे सद्गुरू हैं. न तो साई ने कभी किसी को अपना चेला ही बनाया, न ही कोई मठ ही स्थापित किया, किसी के कान में कोई गुरुमंत्र भी नहीं फूंका. न उन्होंने कभी किसी गुरु की तरह चोला पहना और न ही कभी अपनी किसी गुरु की तरह पूजा करने को किसी को बाध्य ही किया. अपने भक्तों द्वारा दी गयी चांदी की पालकी में कभी साई स्वयं बैठे भी नहीं. साई ने तो कभी माला भी नहीं फेरी. कोई कुल नहीं बनाया.
गुरुओं की स्थापित मान्यता के विरुद्ध साई तो हमेशा फटे कपड़ों में ही फिरते, पांच घरों से मिलती भिक्षा पर गुज़ारा करते. एक टूटी-फूटी ईमारत में रहते. कीचड़ से भरे फ़र्श पर सो जाते. दान में मिले तेल से अपने ठिकाने, अपनी मस्जिद को रोशन रखते. उनके अधरों पर सदा ही ‘अल्लाह मालिक’ रहता. सादगी इतनी कि वे तो सदा अपने आप को ईश्वर का दास मानते. अपना गुणगान करने वाले दासगणु महाराज का वे स्वयं को ऋणी मानते और मस्ती में ख़ुद को दासानुदास कहते. दास का भी दास! साई की शिक्षा पद्धति एकदम अलग रही. इस धरती पर अपने शारीरिक अवतार के अंतिम पड़ाव में उन्होंने अपने भक्तों को दान की महत्ता समझाने के लिए उनसे दक्षिणा लेना शुरू कर दिया था. उन्होंने कभी भी शास्त्रों, वेदों, पुराणों या क़ुरान के श्लोक या आयतें कभी किसी को नहीं समझाई और न ही कभी कोई बड़ी मुश्किल भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने तो सदा ही इन महान धार्मिक पुस्तकों का निचोड़ अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों के माध्यम से समझाया. साई की शिक्षा पद्धति में इन पुस्तकों के शब्दों का अर्थ नहीं बल्कि शब्दों के पीछे के भावों का अर्थ ज़रूरी रहा जिसे उन्होंने बहुत ही सरल तरीके से अपने भक्तों को समझाया.

ऐसे ही एक अवसर पर जब मस्जिद में नानासाहेब चांदोरकर ने श्रीमद् भगवद्गीता का एक श्लोक, “त्वद्दिधि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया, उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानित्त्त्व दर्शिनः” बोला तब बाबा ने उनको यह श्लोक पुनः दोहराने को कहा. अपनी सीमित बुद्धि के चलते नानासाहेब ने दंभ भरे अंदाज़ में यह श्लोक यह समझ कर पुनः बोल दिया कि साई बाबा का संस्कृत से क्या वास्ता! लेकिन जब बाबा ने शब्दों के परे जाकर श्लोक के एक-एक शब्द के पीछे के भाव को नानासाहेब को समझाया तब नानासाहेब के आश्चर्य का कोई अंत न रहा. मंत्रमुग्ध वे बाबा के ज्ञान की थाह पाने की कोशिश ही करते रहे. बाबा ने इस श्लोक की व्याख्या कर नानासाहेब को समझाया कि अपने अहंकार को छोड़, पहुंचे हुए सिद्धपुरुषों के शरणागत हो जाने से मनुष्य के ज्ञान पर पड़ा आवरण हट जाता है और ज्ञान पुनः चमकने लगता है. मतलब यह हुआ कि साई के अनुसार गुरु किसी को भी ज्ञान नहीं देते हैं सिर्फ़ किसी में जो ज्ञान पहले से ही है उसका अहसास कराते हैं. हमारे ज्ञान के ऊपर जो परत चढ़ जाती है, गुरु सिर्फ़ उन परतों को साफ़ करते हैं. मानो कोई हमारी आँखों में पड़े कचरे को कोई साफ़ कर दे जिससे हमें फिर से साफ़-साफ़ दिखाई देने लगे.
यही गुरु शब्द का अर्थ भी है. ‘गुरु’ को दो शब्दों में बांटने पर हमें ‘गु’ और ‘रु’ मिलते हैं. गुरु गीता के अनुसार ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ होता है हटाने की क्रिया. तब गुरु शब्द का अर्थ हुआ अंधकार हटाने की क्रिया. इसी तरह दीक्षा को जब दो भागों में तोड़ कर देखते हैं तो ‘दी’ का अर्थ दाग़ और ‘क्षा’ का अर्थ साफ़ करने की प्रक्रिया. गुरु द्वारा किसी को दीक्षित करने का अर्थ होता है दाग़ साफ़ करने की प्रक्रिया. यही कार्य साई बाबा ने तमाम उम्र किया. उन्होंने अपने जीवन जीने के तरीके से अपने भक्तों के जीवन से दाग़ हटाने का ही कार्य किया. आज भी कर रहे हैं.

हम सभी इस धरती पर परमपिता परमात्मा से एक निर्मल स्वरुप लेकर आते हैं. जब हम छोटे से बच्चे होते हैं तो हमें चोरी-छल-कपट, धोखा, लोभ-लालच, शोक, अभिमान के बारे में कुछ भी मालूम नहीं होता. जीवन का आनंद लेते हुए अपने में मस्त भी रहते हैं और दूसरों को आनंद भी देते हैं. आराम से नींद भी आ जाती है. सोते हुए जब मुस्कुराते हैं तो लगता है कि भगवान् से बातें कर रहे हैं. हम सभी के प्यारे होते हैं, दुलारे होते हैं, आँखों के तारे होते हैं. यह हमारा मूल स्वरुप होता है.
अब शुरू होती है स्वरुप से स्वभाव की यात्रा. स्वरुप से स्वभाव की यह यात्रा सुख से दुःख की यात्रा बन जाती है. सुख, शांति और आनंद शोक, मोह और भय में बदल जाते हैं. बड़े होने लगते हैं तो हमारा स्वरुप हमसे दूर होता जाता है. लोभ और मोह की वासना में बहुत कुछ पा लेने की इच्छा मन में लिए हुए हम धोखा देने लगते हैं. झूठ भी बोलते हैं. अपनों का अपमान कर उनसे दूर भी हो जाते हैं. मुस्कुराना भूल जाते हैं. छोटी-छोटी बातों पर झल्लाना, चिल्लाना शुरू कर देते हैं. दूसरों को आनंद देना तो दूर, उनके भी दुःख का कारण बन जाते हैं. हमें अब नींद नहीं आती. एकांत ढूंढते हुए कब अकेले पड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता. अकेले पड़ते ही आँखों से आंसूं बहने लगते हैं. कोई सहारा ढूंढते हैं. तब साई सहारा बन कर आते हैं.


सद्गुरू बन कर साई पहले तो चमत्कार कर हमें अपनी तरफ़ खेंचते हैं. फिर धीरे-धीरे हमारे मन में बस कर वहाँ की गंदगी साफ़ करने लगते हैं. उनका जीवन चरित्र और उसकी विशेषताएं हमारे अँधेरे जीवन में आशा की किरण दिखा देती है. अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, मन के एक कोने से आवाज़ आती है. हमारे मन की गहराइयों में साई हमें अपना मूल स्वरुप दिखा कर फिर से याद दिलाते हैं कि कभी हम कैसे थे और अब कैसे हो गए हैं. उस स्वरुप को देख, मन में फिर से स्वभाव से स्वरुप की यात्रा करने की इच्छा प्रबल हो उठती है. मन का सारा मैल, पश्चाताप के आंसुओं में धुलकर बाहर निकलने लगता है. अब काम की इच्छा तो रहती है लेकिन शत्रोक्त. क्रोध भी आता है लेकिन अपनी कमियों पर. मोह बढ़ता जाता है लेकिन सद्गुरू के चरणों का. लोभ भी रहता है लेकिन साई की संगत का. इर्ष्या भी होती है लेकिन सकारात्मक. अभिमान स्वाभिमान में बदल जाता है. साई सारे ही अवगुणों का पट बदल देते हैं.
बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के साई हमारे सारे अवगुणों का रूप बदल देते हैं, हमें बदल देते हैं. अपने इस बदले स्वरुप में हम ख़ुद को फिर से प्यारे लगने लगते हैं, दूसरों से सम्मान पाने लगते हैं. साई की गुरुता का अहसास हमें होने लगता है. मन ही मन हम साई की गुरुता को अपने शिष्यत्व के माथे पर रख देते हैं. सच ही तो है, हममें शिष्य बनने की इच्छा हो तो भगवान् स्वयं सद्गुरू का रूप लेकर आ जाते हैं. साई हमारे अन्दर सुधार की इच्छा को प्रबल कर शिष्यत्व का भाव पैदा करते हैं. ऐसे सद्गुरू साई के चरण अपने आंसुओं से धोने का दिल कर उठता है.    
                  
बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु

Thursday, 2 June 2016

साईराम ही क्यों?


साई के भक्त आमतौर पर एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए ‘साईराम’ बोलते हैं. साई के साथ राम! क्या साई और राम को हम एक ही मानते हैं? क्यों किसी और अवतार के साथ साई बाबा का नाम जोड़ कर लगातार नहीं बोला जाता जबकि सद्गुरू साई में तो सभी अवतार निहित हैं! जब साई सदेह थे तो उनके समकालीन लोगों ने अपने इष्ट या आराध्य को साई में अलग-अलग अवसरों पर देखा. किसी को कृष्ण तो किसी को दत्तात्रेय साई में दिखे. किसी को कृष्ण तो किसी को अपने गुरु घोलप स्वामी. किसी को अक्कलकोट के स्वामी समर्थ साई में दिखे तो मेघा साई को शंकर मानकर ही उनकी पूजा करता. एक डॉक्टर तो शिर्डी आये ही इसी शर्त पर थे कि वो बाबा को मुसलमान मानते हैं और उनके आगे नमन नहीं करेंगे लेकिन जब बाबा में उनको अपने आराध्य रामचंद्र भगवान् दिखे तो उन्होंने न सिर्फ़ बाबा को नमन किया बल्कि उन्हें बाबा के दर्शन कर परम आनंद की अनुभूति भी हुई. इसी तरह 1916 में बाबा से पैसे मिलने की लालच में शिर्डी आई मद्रासी भजन मंडली की महिला प्रमुख को बाबा ने सीतानाथ यानि रामचंद्र भगवान् के रूप में दर्शन दिए. जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का..
जब बाबा में सभी को अपने-अपने इष्ट के दर्शन हुए तो फिर सामान्य उद्बोधन और अभिवादन में साई और राम के जुड़ने की कोई न कोई तो वजह होगी ही. यह भी साई की ही एक लीला है और साई की लीलाओं में कई सारे अर्थ निहित होते हैं. क्या हम सभी को साई और राम के चरित्र में कोई या कई सारी समानताएं दिखती हैं?
भगवान् विष्णु के दस अवतारों में सातवें, राम की अपनी महिमा और उनके चरित्र की महत्ता अपना अलग स्थान भक्तों के मन में रखती है. दशरथ और कौशल्या के ज्येष्ठ पुत्र रामचंद्र को युगपुरुष माना जाता है.
अपने पिता के वचन को निभाने के लिए उन्होंने राजगादी का मोह छोड़, चौदह वर्ष वन में बिताये. साई के माता-पिता के बारे में किसी को स्पष्ट रूप से मालूम नहीं है. साई को तो अयोनिज माना जाता है. जो किसी भी योनि से उत्पन्न न हुआ हो. ऐसे में सर्वशक्तिमान ईश्वर को साई की उत्पत्ति का मूल माना जा सकता है. उसी सर्वशक्तिमान ईश्वर की संतान होते हुए साई ने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा एक वनवासी की तरह ही बिताया. एक टूटी हुई ईमारत, जो कि एक पुरानी मस्जिद थी, को अपना बसेरा बनाने से पूर्व साई को शिर्डी में या तो नीम के पेड़ के नीचे तपस्या में बैठा देखा गया या फिर जंगलों और पहाड़ों में भटकते हुए. साई तो उस मस्जिद में रहते हुए भी बारिश में टूटे-फूटे फर्श पर ही सोते और फटी हुई टाट का टुकड़ा उनका आसन होता. साई का जीवन तो राम के वनवास जैसा ही रहा.
राम ने गुरु वशिष्ठ के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखा और उनके बताये मार्ग से कभी भी भटके नहीं. मीठे पत्तों वाले कड़वे नीम को तो साई ने अपने गुरु का धाम बताया. अपने गुरु और उसी नीम के प्रति उनकी अखंड, अगाध श्रद्धा ने साई को सद्गुरू का दर्जा दिया. अपने गुरु की सीख पर साई ने अपना जीवन जिया और उन्हीं के सदृश साई ने अपने भक्तों को अपने गुरु की शिक्षा का अंश बांटा. अपने गुरु के प्रति इसी आदर भाव ने साई को आराध्य बनाया.
केवट और शबरी की सेवा लेकर राम ने जन्म से प्राप्त जाति के भेद को निर्मूल कर दिया. बायज़ामाई द्वारा बलपूर्वक भोजन खिलाने के पूर्व साई एक वनवासी की ही तरह कंद-मूल पर ही रहते ऐसा माना जाता है. ईश्वर का अंश होते हुए भी उन्होंने एक साधारण भिक्षुक की तरह अपना निर्वाह मांग कर ही किया. भक्तों के बचे, जूठे भोजन को ग्रहण कर, साई ने अपने को भिक्षा दान देने वालों को शबरी का दर्जा दे दिया. इस तरह जो भी भोजन मिलता, साई उसमें से कुछ लेकर बाकी बचा हुआ सभी के ग्रहण करने के लिए छोड़ देते. साई का प्रसाद उनके आश्रितों के लिए इस तरह महाप्रसाद बन जाता. साई ने भी कभी जाति के भेद को अपने जीवन में स्थान नहीं दिया. उनके पास कभी भी कोई भी जा सकता था और अपने इष्ट को छू सकता था. इसी भाव को जागृत करते हुए साई ने कहा भी तो था, “अपने बीच की तेली की दीवार गिरा दो.
लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के भाई के रूप में रामचंद्र भगवान् ने आदर्श बड़े भाई का रूप निभाया और अपने भाइयों को न सिर्फ़ वात्सल्य से सराबोर रखा बल्कि उनकी हमेशा रक्षा की. साई ने भी अपना प्यार न केवल अपने भक्तों में बांटा बल्कि श्री साई सच्चरित्र में ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं कि साई को ही अपने प्राणों का आधार मानने वालों की साई ने अपनी देह को तकलीफ़ देकर और अपने प्राण न्यौछावर कर के भी रक्षा की.
जिस तरह राम ने राज्य का मोह छोड़, छोटे भाई भरत को सम्पूर्ण राजपाट दे दिया था उसी तरह साई ने कभी भी अपने स्थान का मोह नहीं रखा. श्री साई सच्चरित्र में उल्लेख आता है कि एक बार जब नानावल्ली ने साई को उनके स्थान से अपमानपूर्वक उठा दिया था तब भी साई के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और न ही उस स्थान से उठाये जाने का कोई दुःख.    
माया के बल पर रूपसी बनकर आयी शूर्पणखा की सम्मानपूर्वक अनदेखी कर अर्धांगिनी सीता के प्रति उनके भाव ने राम को एकनिष्ठ, अव्यभिचारिणी निष्ठा का प्रतीक बनाया. इसी तरह साई के मन में कभी किसी स्त्री को देख कर लंपटता के भाव उत्पन्न नहीं हुए. रामभक्त हनुमान की तरह साई ने अखंड ब्रहमचर्य को निभाया और राम के सेवक के गुण भी अपने अन्दर आत्मसात कर लिए. हनुमान की स्वामी-भक्ति को स्वीकार कर राम ने हनुमान को मान दिया. हनुमान के बिना राम की और राम के बिना हनुमान की तो कल्पना भी करना कठिन है. साई तो सदा मस्जिद में आई प्रत्येक महिला को आई या माई कह कर ही संबोधित करते. साई का मन तो सदा ही ईश्वर में स्थापित रहता. उसे कोई भी प्रलोभन कभी अपने स्थान से डिगा न सका. 
वन से लौटकर राम ने एक आदर्श स्थापित कर राजपाठ चलाया. साई ने भी बिना किसी भेद-भाव के अपने भक्तों की इच्छा उसकी योग्यता अनुसार पूरी की. द्वारकामाई मस्जिद से तब भी और आज भी साई के भक्तों को काम, अर्थ, ज्ञान और मोक्ष उनके प्रारब्ध और कर्मों के अनुसार मिलता ही रहा है.
उदाहरण स्थापित करते हुए राम ने राज्य के एक नागरिक के संशय ज़ाहिर करने पर उसी प्राणप्रिय सीता का गरिमापूर्ण त्याग किया. अपने आज्ञाकारी सेवक माधव फासले के हाथों एक ईंट के टूटने पर बाबा ने भी अपनी जीवन संगिनी का दूर होना कहा था और उसके टूटने को अपने स्वधाम गमन का प्रतीक माना था.
समय आने पर रामचंद्र भगवान् ने सरयू नदी में अंतर्ध्यान होकर अपनी देह का त्याग किया. साई ने भी राम की रावण पर विजय वाले दिन को ही देह-त्याग के लिए चुना. चुना इसलिए कहा गया है क्योंकि साई ने इस बात के पुष्ट संकेत दो साल पहले से ही देना प्रारम्भ कर दिए थे.
राम ने आजीवन मर्यादा को ही जिया. साई ने भी आजीवन पूर्ण मर्यादा का ही पालन किया. जिस तरह राम का जीवन एक आदर्श के रूप में हमारे सामने आता है उसी तरह साई का जीवन भी हम भक्तों के लिए सदा ही आदर्श है.



शिर्डी में रामनवमी उत्सव
रामनवमी, गुरु पूर्णिमा और समाधि-दिवस के तीन उत्सव शिर्डी में आज भी मुख्य रूप से मनाये जाते हैं. इन तीनों ही मौकों पर तीन दिन तक शिर्डी में उल्लास और उत्साह का माहौल रहता है. पूरे क्षेत्र को दुल्हन से समान सजाया जाता है, श्री साई सच्चरित्र का पारायण किया जाता है, भजन-कीर्तन से वातावरण गुंजायमान हो जाता है, शोभा-यात्राएं निकाली जाती हैं, दूर-दूर से श्रद्धालु पालकी लेकर चलते हुए बाबा के दर पर पहुँचते हैं. बाबा की पावन समाधि के दर्शनों के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती हैं. नारदीय कीर्तन प्रणाली के प्रतीक-स्वरुप वीणा लेकर, पोथी के साथ बाबा की पादुकाएँ और सटका लेकर श्री साई बाबा संस्थान विश्वस्त व्यवस्था के विश्वस्त और अधिकारी इनको सम्मानपूर्वक बाबा की समाधि को लेकर जाते हैं. इस पूरी व्यवस्था में पहला दिन उत्सव का प्रारम्भ गिना जाता है तो दूसरा मुख्य दिवस और तीसरे दिन को अंतिम दिन माना जाता है. इनमें रामनवमी और गुरु पूर्णिमा उत्सव बाबा के समय से, उन्हीं की आज्ञा से मनाये जाते हैं. दहशरा उत्सव बाबा के बाद शिर्डी में मनाया जाने लगा.

उर्स की शुरुआत
नीमगाँव निवासी संतानहीन नानासाहेब डेंगले को बाबा के आशीर्वाद से ही शादी के कई सालों बाद संतान हुई तो उन्होंने बाबा को सोने के लिए लकड़ी का वो एक हथेली चौड़ा और तीन हाथ लम्बा पटला भेंट में दिया था जिसे बाबा चिंदियों से बाँध कर, छत से लटकाकर, उसके चारों कोनों पर दीपक जला कर, चैन से सोते थे. इन्हीं नानासाहेब डेंगले के मित्र थे कोपरगाँव के सर्किल इंस्पेक्टर गोपालराव गुंड, जो नानासाहेब की ही तरह संतानहीन थे. तीन शादियों के बावजूद उनके घर किलकारी नहीं गूँज पाई थी. नानासाहेब के कहने पर उन्होंने बाबा से संतान मांगी और उन्हें मिली भी. घर में ख़ुशी का माहौल बन गया.
इसी ख़ुशी को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके मन में विचार आया कि साई बाबा का उर्स मनाया जाए. उन्होंने इस बारे में दादा कोते, तात्या कोते और शामा से बात की. सभी को यह ख़याल अच्छा लगा लेकिन बाबा से अनुमति लिए बगैर तो शिर्डी में कुछ हो ही नहीं सकता था. बाबा से इस बाबत अनुमति चाही गयी और बाबा से अनुमति मिल भी गयी. रामनवमी के दिन ही उर्स भरने की अनुमति बाबा द्वारा दी गयी. महान सुखद संयोग! 
पश्चिम एशिया में सूफ़ी सम्प्रदाय में उर्स मनाने की परम्परा रही है. आमतौर पर उर्स तो सूफ़ी संतों की पुण्यतिथि पर मनाया जाता है. इन संतों को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है और उनकी मृत्यु को ईश्वर से एकाकार होने का अवसर मानकर उत्सव एक शादी के रूप में मनाया जाता है. इस मामले में साई बाबा की विशेषता रही कि वे दुनिया के एकमात्र ऐसे संत माने जाते हैं जिनके जीते जी उनका उर्स मनाने की परंपरा प्रारम्भ हुई.
उर्स को मनाने के लिए स्थानीय कलेक्टर से शासकीय अनुमति चाही गयी. शासकीय प्रक्रिया के पालन में कलेक्टर ने शिर्डी के कुलकर्णी (पटवारी) से अभिमत माँगा. इर्ष्या के चलते उन्होंने अनुमति नहीं दिए जाने सम्बन्धी अभिमत दिया. लेकिन बाबा की अनुमति थी तो साई के भक्तों ने इस बाबत एक बार और प्रयास किया. इस बार अनुमति मिल गयी.
इस तरह 1897 से शिर्डी में साई बाबा का उर्स मनाया जाने लगा. इस उर्स में बहुत अधिक संख्या में लोग आते. कई सारी दुकानें लगती. कव्वालियाँ गाई जाती. कुश्तियां होती. बाहर से पानी मंगवाया जाता. शिर्डी साई की आभा से दमकती रहती.

हिन्दू-मुस्लिम एकता
इस उर्स का स्वरुप बढ़ता गया. गुंड के ही मित्र थे दामू अन्ना कासार. उन्हें भी बाबा की कृपा से संतति प्राप्त हुई थी. उन्होंने गुंड के कहने पर इस उर्स के लिए ध्वज दिया. एक दूसरा ध्वज नारंगी और हरे रंग में नानासाहेब निमोणकर ने दिया. जुलूस में दोनों ध्वज लाये जाते और द्वारकामाई के ऊपर स्थापित कर दिए जाते. आगे बाबा के एक और भक्त अमीर शक्कर को हुई प्रेरणा पर इसी उर्स में चंदन उत्सव की शुरुआत हुई. बहुत सारा चंदन और धूप घिस कर थालियों में भरा जाता है और लोभान जलाया जाता है. इसको जुलूस में मस्जिद लाया जाता. धूप और चंदन नीम और मस्जिद की दीवारों पर डाल दिया जाता.
हिन्दुओं का ध्वज और मुसलमानों की चंदन यात्रा एक साथ चलने लगी. प्रत्येक वर्ष यह उर्स रामनवमी के दिन ही भरता.

उर्स जो उत्सव बन गया
इस अद्भुत् संयोग के चलते 1911 में श्री कृष्णराव जोगेश्वर भीष्म को प्रेरणा हुई, लक्ष्मण उर्फ़ काका महाजनी से साझा की और बाबा की अनुमति से उर्स में राम-जन्म, कीर्तन और गोपालकाला जोड़ कर इसे रामनवमी उत्सव का स्वरुप दिया गया. उस वर्ष राम-जन्म का गायन भीष्म ने ही किया और बाद में बालाबुवा सुतार, सातारकर और दासगणु महाराज ने यह ज़िम्मेदारी सम्हाली. उर्स उत्सव बन गया.
     
       बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु