Wednesday, 10 February 2016

चावड़ी महोत्सव : साई नाम की मस्ती



श्री साई अमृत कथा में बाबा की बातें करते हुए कथा के माध्यम सुमीत पोंदा भाईजी साई बाबा के जीवन चरित्र पर आधारित घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि साई बाबा का भक्तों के भाव में रहने का उल्लेख जब भी किया जाता है तो चावड़ी महोत्सव का माहत्म्य उभर कर सामने जाता है.
यह सबको पता है कि शिर्डी में अपने दूसरे प्रवास के दौरान, म्हालसापति की अव्यक्त अनिच्छा के चलते साई बाबा को जब खंडोबा मंदिर में प्राश्रय नहीं मिल पाया था तो उन्होंने कुछ दिन नीम के पेड़ के नीचे और कुछ दिन जंगलों में बिताने के बाद जिस टूटे-फूटे भवन को अपना आशियाना बनाया, वह एक पुरानी मस्जिद थी जिसमें सालों पहले इबादत होना बंद हो गयी थी. इस मस्जिद में छत के नाम लकड़ी के कुछ, कभी भी टूट सकने वाले मोटे जर्जर लठ्ठों पर कुछ पत्थर की फर्शियां टिकी थीं और फर्श के नाम पर कच्ची मिट्टी थी जो बारिश के दिनों में बहुत परेशान करती थी. बाबा तो ठीक से बैठ पाते और ही सो पाते. रात करवटें लेते-लेते निकलती.
उस वक़्त उस फ़क़ीर को जानता तो शिर्डी गाँव था लेकिन पहचानने वाले कम ही थे. वो फ़क़ीर उसी रिसती-भीगती-भिगाती मस्जिद से ही शिर्डी की तक़दीर बदलने बैठा था. कुछ कदम पर शिर्डी गाँव का टूटा-फूटा सभा कक्ष भी था. यह मस्जिद से तो बेहतर स्थिति में था. गाँव के लोग इसे चावड़ी कहते थे. यह चावड़ी मानों बाबा की प्रयोगशाला थी. किसी को एकांतवास के लिए बाबा यहाँ भेजते तो किसी को अहंकार से मुक्ति के लिए तो किसी को रोगों से मुक्ति के लिए. किसी को समझ में नहीं आता कि बाबा जो काम मस्जिद में भी कर सकते थे, उस काम के लिए उन्हें चावड़ी की ज़रुरत क्यों पड़ी! फ़क़ीर के भेद निराले, वही जानता है कि वो क्यों कुछ करता है. अलग-अलग गुरु भी तो शिष्य को शिक्षा अपने ही ख़ास ढंग से देते हैं. कुछ समझाते हैं तो कुछ सज़ा भी देते हैं लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में फ़ायदा शिष्य का ही होता है.
समय गुज़रता गया. उस फ़क़ीर की साख और उसका चरित्र शिर्डीवासियों को समझ में आने लगा. उन्हें कहीं अहसास होने लगा था कि उनके भाग्य में इस हीरे के माध्यम से सकारात्मक फेर आने वाला है. अब बारिश हुई तो लोग बाबा को चावड़ी में रहने को कहने लगे. भाव से भीने होने वाले शिर्डी के इस भगवान् ने अपने गांव वालों की यह बात भी मान ली लेकिन मस्जिद में रहना नहीं छोड़ा. चाहे जैसा मौसम हो, एक रात मस्जिद में तो एक रात चावड़ी में बाबा रहने लगे.
मस्जिद में तो उनके साथ रात में सोने वालों में तात्या पाटिल और भक्त म्हालसापति थे लेकिन चावड़ी में बाबा अकेले सोते. नानासाहेब डेंगले द्वारा एक हथेली चौढ़े और ढाई हाथ चिंदियों से लटका कर रखे लकड़ी के तख्ते पर सोने का क्रम यहीं का माना जाता है. इस लकड़ी पर चारों कोनों में बाबा एक-एक दीपक भी जला लिया करते थे. क्या ये क्रिया महज बाबा के योग सिध्धियों पर नियंत्रण को बताती हैं या एक फ़क़ीर का उस अनुभव लेने को दर्शाती हैं जिसे साधारण मनुष्य जीते हैं? जीवन भी तो इसी तरह रिश्तों की कच्ची डोर से बंधे एक पतले, संकरे रास्ते जैसा ही है, जिसमें होश खोकर संतुलन खोया तो पतन की आशंका बनी रहती है. इस रास्ते पर हर दिशा से प्रकाश आने देना चाहिए, ऐसा यह चार दिए बताते हैं. जीवन में हर पल, हर दम जागरूक और संवेदनशील रहना चाहिए, शायद बाबा की यह अद्भुत क्रिया यही बताती है.
राधाकृष्णमाई के शिर्डी आगमन के कुछ समय बाद तो हर चीज़ मानो एक निश्चित आकार लेने लगी. बाबा के चावड़ी में सोने जाने को एक उत्सव के रूप में मनाने का ख्याल आया. धनी भक्तों से रथ, पालकी, वाद्ययंत्र, बर्तन, इत्यादी का बंदोबस्त करने को कहा गया. कोई चंवर, चिपलिस, ढोल, मंजीरे ले आया तो कोई ध्वजा. बाबा को यह बहुत नागवार गुज़रा. उन्हें इस आन-बान से कोई लेना-देना था ही नहीं. लेकिन भगवान् ने कभी अपने भक्तों की इच्छा टाली है भला?
9 दिसंबर, 1910. पहली बार बाबा की पालकी निकली. भक्तों के बहुत मान-मुनौव्वल के बाद बाबा इस चावड़ी यात्रा के प्रस्ताव पर राज़ी हो गए लेकिन पालकी में बैठने की बात पर राज़ी नहीं हुए. वे इस यात्रा में पैदल ही चलते. पालकी में उनकी छवि और पादुकाएँ रखी जातीं. मस्जिद में कोई ठीक व्यवस्था होने के कारण, पालकी बाहर सड़क पर ही रखी रहती. एक दिन उसमें से कोई चोर चांदी के हाथी निकल कर ले गए. कोहराम मचने पर उन्होंने कहा कि  पूरी पालकी ही क्यों नहीं ले गए! इसी तरह उन्होंने भक्तों के द्वारा अर्पण किये हुए कढ़ाईदार अंगरखे तो पहने लेकिन अपनी फटी-पुरानी कफनी के ऊपर.
मस्जिद में भजन होते. बाबा की षोडशोपचार पूजा के बाद, तात्या के सहारे से उठते बाबा अपने हाथ से मस्जिद से निकलते समय, वहाँ का दीपक बुझा देते. मानो पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देने के लिए. लोगों को मुक्त-हस्त से उदी बांटते. सबसे पहले अपने सजे-संवरे घोड़े, श्यामसुंदर के माथे पर अपने हाथों से बाबा उदी लगाते. ढोल-नगाड़े, गाजे-बाजे, लालटेनों की कतार और रंग-बिरंगी आतिशबाज़ी के बीच बाबा की छतरी पकडे भागोजी शिंदे होते तो उनके एक तरफ काकासाहेब दीक्षित और दूसरी तरफ़ नानासाहेब निमोणकर. तात्या और म्हालसा और उनके जैसे कितने ही भक्त, भक्ति में सराबोर नृत्य करते. कुछ कदम का फासला और यह पालकी यात्रा कोई दो-ढाई घंटे में ख़त्म होती. बीच में मारुती मंदिर के सामने बाबा रुक कर कुछ अबूझ इशारे करते. मानो कोई बातें कर रहे हों. बाबा रहस्य ही तो हैं, हर मतलब से परे! पूरा वातावरण भक्ति से अभामयी हो उठता. चावड़ी पहुँचने पर कोई उनके पाद प्रक्षालन करता तो कोई चिलम सुलगा कर देता. ज्ञानदेव और तुकाराम की आरतियों के समय बाबा सम्मानपूर्वक स्वयं खड़े हो जाते. गद्दियों के ढेर पर जब बाबा रात्रि-विश्राम के लिए जब सोने को होते तो तात्या उन्हें एक गुलाब देते. बाबा उन्हें कहते कि रात में उनकी खबर लेतें रहें.

प्रश्न उठता है कि हमेशा ऐच्छिक दीनता में रहने वाले और करुणा से भरे साई ने इस वैभवपूर्ण चावड़ी यात्रा की अनुमति क्यों दी. क्या केवल भक्तों के बस में रहने वाले साई के पास भक्तों के अनुरोध के सिवा भी कोई कारण था? साई के दर पर मांगने आने वालों में समय के साथ-साथ अत्यधिक शिक्षित, धनाढ्य और उच्च पदों पर सुशोभित लोग आने लगे थे. स्वभावतः इतने संपन्न व्यक्तियों का अहंकार एक फटे कपड़े पहने फ़क़ीर के सामने पूरी तरह झुकने या अपनी झोली फैलाने से उनको रोकता ही होगा. उनका अहंकार घटाने के लिए बाबा ने ऐसी लीला रची जिससे उनका सर्वशक्तिमान, राजाधिराज वाला स्वरुप सामने उभर कर सके और साथ में उनकी सादगी भी परिलक्षित होती रहे. किसी के अहंकार को छोटा करना हो तो उसके सामने अपना कद बढ़ा लेना चाहिए.

साई के रंग अनेक और उनके रूप कई हज़ार. कहाँ तक हम थाह पा सकेंगे?

        
बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु

साई का ग़ुस्सा



कहते हैं, जिसने संत के हाथ की मार खा ली, उसका जीवन संवर गया. उसे हमारे संत साई अपने रंग में ऐसे रंग लेते हैं कि उसका रंग ही बदल जाता है. लड़खड़ा के चलने वाला सम्हल जाता है. रास्ते के पत्थर को दाम मिल जाता है. टिमटिमा के जलने वाले दीपक को नाम और बिन मक़सद के जीवन को काम मिल जाता है. साई का नाम लेने और ध्यान करने से गुम राहें मिल जाती हैं और अँधेरी राहों में रौशनी मिल जाती है. श्री साई अमृत कथा में बाबा की बातें करते हुए कथा के माध्यम सुमीत पोंदा भाईजी साई बाबा के जीवन चरित्र पर आधारित और श्री साईं सच्चरित्र में वर्णित घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि कई दफे साई बाबा के ग़ुस्से का, उनके द्वारा अपशब्द बोले जाने का ज़िक्र भी आया है. एकादशी के दिन साई बाबा द्वारा वमन की हुई प्याज़ खाने पर तो कुशाभाव की पिटाई की बात भी सामने आती है.
लोग अकसर पूछते हैं कि क्या एक संत को ऐसे क्रोध करना शोभा देता है! क्या संत वो नहीं है जिसने अपने मनोभावों पर नियंत्रण पा लिया हो? ऐसा ही है लेकिन किसी भी संत के अंतःकरण में विश्व के कल्याण की भावना सर्वोपरि होती है. अगर श्रीमद् भागवत महापुराण की बात माने तो ये भी उतना ही सटीक है कि इस जगत के कल्याण हेतु संतों के रूप में भगवान् ही मानव अवतार लेकर आते हैं. जब मानव अवतार लेकर आये हैं तो क्रोधरूपी तमोगुण उनका स्वाभाविक आभूषण है.

साई बाबा तो सद्गुरू, परमहंस का चोला पहने थे. कहते हैं, शेर का दहाड़ना ही अच्छे-अच्छों को घिग्गी बाँधने पर मजबूर कर देता है. अगर शेर दहाड़ना ही छोड़ दे तो लोग उसे सड़क का श्वान समझ कर पत्थर मारेंगे. संतों का गुस्सा कई बार आमजन को सुधारने का एक माध्यम ही होता है लेकिन उनका क्रोध आवेश-रहित होता है. क्रोध में अगर आवेश न हो तो वह प्रेम का ही एक विस्तारित स्वरुप होता है. ठीक वैसे ही जैसे एक माँ का अपने बच्चे पर क्रोध करना उसके प्रेम का ही विस्तार होता है. उस क्रोध में वो अपने बच्चे को हानि नहीं पहुंचाती. उसके मन में क्रोध के समय भी वात्सल्य उमड़ता रहता है.
ऐसा ही क्रोध साई का है. बिलकुल समुन्दर जैसा. उथल-पुथल सिर्फ लहरों तक सीमित और नीचे गहराई में अथाह शांति जिसमें जलचर स्वच्छंद रूप से विचरण करते हैं. उपर से तो कई दफे क्रोध करते दिखते लेकिन अन्दर ही अन्दर वे एकदम शांत और प्रेम से भरपूर थे. उनके ह्रदय में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने भक्तों, बच्चों के लिए प्रेम रहता.
हाजी सिद्दीक फालके का हज करने सम्बन्धी अभिमान तोड़ने के लिए बाबा द्वारा किया गया क्रोध, बाबा द्वारा उनको संतरे भेंट करने में परिणित हुआ. मेघा के ऊपर किया क्रोध, उसे बाबा की ओर खींचता गया और वो बाबा के अभिन्न भक्तों में सम्मिलित हो गया. उसके शव पर बाबा द्वारा अभूतपूर्व शोक प्रगट करने के साथ मेघा की मृत्यु सार्थक हो गयी. अपनी अनुमति के बगैर मस्जिद में नानासाहेब चांदोरकर और काकासाहेब दीक्षित द्वारा काका महाजनी को पुनर्निर्माण के कार्य में लगाया जाना भी बाबा को नागवार गुज़रा. उन्होंने उसी समय न सिर्फ़ पुनर्निर्माण में प्रयुक्त खंभे उखाड़ कर फ़ेंक दिए बल्कि तात्या की पगड़ी भी धूनी को समर्पित कर दी. लेकिन इसी सब के दौरान काका महाजनी को मूंगफली खिलाते हुए उन्होंने काका का उदर रोग ठीक कर दिया. बाद में अपने हाथों से तात्या को नयी पगड़ी भी पहनाई. दामूअन्ना कासार को जब बाबा ने आम दिलवाते हुए ग़ुस्से में कहा कि खाकर मरने दो इसको, तब वो संततिहीन दामू के लिए संतति का वरदान लेकर आया. लोभवश अपने आंचल में बाबा द्वारा अपने हाथों से पीसा आटा लेकर उठने को हुई महिलाओं पर बाबा का क्रोध, उस आटे में शिर्डी को प्लेग के प्रकोप से बचाने की लीला के रूप में समझ आया.
मर्यादा छोड़ चुके बादलों पर बाबा की गर्जना से उनका मूल स्वरुप में आ जाना और धूनी की अल्हड़, बेक़ाबू लपटों को सटके की मार से ठीक कर देना और शिर्डी-निवासियों को उनके प्रकोप से बचाना भी साई के प्यार-भरे ग़ुस्से की ही एक बानगी है. एकादशी पर प्याज़ का सेवन न करने सम्बन्धी कुशभाव के अंधविश्वास को अपनी मार से ठीक करना और उसे यह वरदान देना कि उसके हाथों से कल्याणकारी उदी का प्रवाह निरंतर होता रहेगा, भी साई के माँ स्वरुप को ही दिखाता है.
माँ के ग़ुस्से से बच्चे का हमेशा कल्याण ही होता है. साई को जो गुस्सा आता था वह दरअसल किसी व्यक्ति विशेष पर न होकर भक्तों की कमजोरियों पर, उनकी दुश्प्रुवृत्तियों पर और कुविचारों पर होता था. साई के ग़ुस्से से हमेशा उनके भक्तों को फ़ायदा ही हुआ है क्योंकि इससे उनके दोषों का शमन अनजाने ही हो जाता था. साई के क्रोध से उनके भक्तों का ही भाग्योदय होता है. इसलिए जब यह लगे कि परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, ऐसे समय में मानना चाहिए कि साई का क्रोध हमारी परीक्षा ले रहा है, राह खोल रहा है कि हम अपने दोषों का शमन कर लें और साई से सन्निकटता पा लें. उसमें छिपे प्यार से हमारा भाग्योदय सन्निकट है.
                 

बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु
www.saiamritkatha.com

साई बाबा के 11 वचन



श्री साई अमृत कथा में बाबा के चरित्र के बारे में बताते हुए, सुमीतभाई पोंदा ‘भाईजी’ बताते हैं कि सभी को विदित है कि साई बाबा बहुत ही कम बोलते थे. वे ज़्यादातर छोटे-छोटे किस्सों और कहानियों में बातें करते थे. अधिकांशतः बाबा उर्दू मिश्रित खानदेशी और क्षेत्रीय बोली के लहजे में हिंदी बोलते थे. बाबा के समकालीन और उनके भक्तों के अनुभवों को पढने से ज्ञात होता है कि न केवल बाबा त्रिकालदर्शी थे बल्कि परम आध्यात्मिक बातें भी वे इन किस्से-कहानियों से सार्थक रूप से सुनने वालों से कह देते. कई दफ़े यह बात किसी को निशाना बना कर कही जाती तो दूसरे इन्हें समझ नहीं पाते लेकिन जिसकी ओर बाबा का इशारा होता था वह बखूबी यह जान जाता कि बाबा किसकी बात, क्यों कर रहे हैं. यह बाबा के ज्ञान देने की वृत्ति थी.
साई बाबा के भक्तों के जीवन में साई बाबा के 11 वचनों की बहुत अहमियत रहती है. शिर्डी में प्रतिदिन बाबा की प्रातः होने वाली काकड़ आरती और छोटी आरती के बीच, बाबा के श्रृंगार के बाद इन वचनों का मूल मराठी रूपांतरण बजाया जाता है. इसके बाद दासगणु महाराज की लिखी, ‘शिर्डी माझे पंढरपुर..’ आरती गाई जाती है. विश्व भर में साई बाबा के मंदिरों में प्रायः इन 11 वचनों के हिंदी अथवा अंग्रेज़ी में छपे अनुवाद भक्तों की सुविधा के लिए दृष्टव्य रखे जाते हैं और बोले भी जाते हैं.
इन वचनों का वैशिष्ट्य है कि यह इतने साधिकारपूर्वक लहजे में लिखे गए हैं कि ऐसा लगता है कि मानो साई बाबा स्वयं हमारे बीच आकर इन्हें अपने श्रीमुख से ही बोल रहे हैं. यह महसूस होता है कि मानो साई स्वयं इन वचनों के माध्यम से हमारे समक्ष खड़े हो गए हैं और मुस्कुराकर हमारी व्याधियों का नाश करने आये हैं. इन्हें पढ़ने अथवा बोलने वालों के मन में सहज ही साई के इन वचनों से अभयत्व का भाव उत्पन्न होने लगता है. ऐसा महसूस होने लगता है कि हमारी समस्याओं का समस्त समाधान इन्हीं 11 वचनों में कहीं समाया हुआ है. हमारे मन के भय इनको बोलने या स्मरण मात्र करने से दूर होने लगते हैं. विचारों में शुद्धता आ जाती है. बोल-चाल का रवैया बदल-सा जाता है. बहुत ही मनोयोग से साई के मसीहाई चरित्र को उजागर करते हैं यह 11 वचन. इनको बोलते-बोलते रोमांच का अनुभव होने लगता है. साई बाबा के चरित्र का सार लगते हैं यह 11 वचन.
इन 11 वचनों को संकलित करने का श्रेय श्री मोहिनीराज पंडित को जाता है जो कि बाबा के अनन्य अनुयायी होने के साथ-साथ मालेगांव में शासकीय अधिकारी भी थे और नासिक से राजस्व अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हुए. उन्होंने कई वर्षों तक साई बाबा संस्थान के प्रकाशन विभाग में भी सेवा दी. साई सगुणोपासना में साई बाबा की मध्यान्ह आरती में गाया जाने वाला अभंग, “अनंता तुला ते कशे रे नमावे..” रचने का श्रेय भी श्री पंडित को ही दिया जाता है.
यह सरलता से माना जा सकता है कि श्री पंडित ने यह 11 वचन 1918 में बाबा के समाधि लेने के बाद 1923 से साई लीला पत्रिका में सिलसिलेवार प्रकाशित हुए दाभोलकर उर्फ़ हेमाडपंत द्वारा रचित श्री साई सच्चरित्र से संकलित किये हैं क्योंकि कहीं भी यह अभिलेखित नहीं है कि बाबा के सदेह रहते यह कार्य हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि श्री साई सच्चरित्र से प्रेरित होकर यह कार्य श्री मोहिनीराज पंडित द्वारा बाबा की मर्ज़ी से ही किया गया है क्योंकि इन 11 वचनों में श्री साई सच्चरित्र का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है. एक प्रकार से देखा जाए तो श्री साई सच्चरित्र में कहीं न कहीं उल्लेखित बाबा के द्वारा अपने भक्तों को दिए गए आश्वासनों का ही स्वरूप इन 11 वचनों में दिखता है.
सुनने में तो यह 11 वचन बहुत ही सरल लगते हैं. भक्त इनको फ़र्राटे से बोल भी लेते हैं लेकिन इनके बहुत ही गहरे अध्यात्मिक अर्थ हैं. भक्तों के आध्यात्मिक उन्नयन का कार्य यह 11 वचन करते हैं. इनका वास्तविक अगर अर्थ समझ में आ जाए तो भक्तों का अध्यात्मिक उत्थान तेज़ी से होता है और वो साई के उस खजाने को पा लेते हैं जो साई दोनों हाथों से उन्हें देना चाहते हैं. एक बेहतर व्यक्ति बनने में यह 11 वचन आमजन की मदद करते हैं.

साई बाबा के 11 वचन

1.   जो शिर्डी में आएगा, आपद दूर भगायेगा.
2.   चढ़े समाधि की सीढ़ी पर, पैर तले दुःख की पीढ़ी कर.
3.   त्याग शरीर चला जाऊँगा, भक्त हेतु दौड़ा आऊँगा.
4.   मन में रखना दृढ़ विश्वास, करे समाधि पूरी आस.
5.   मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो.
6.   मेरी शरण आ ख़ाली जाए, हो तो कोई मुझे बताये.
7.   जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का.
8.   भार तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा.
9.   आ सहायता लो भरपूर, जो माँगा वह नहीं है दूर.
10. मुझमें लीन वचन, मन, काया; उसका ऋण न कभी चुकाया.
11. धन्य-धन्य वह भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे न अन्य.

बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु