Wednesday, 7 October 2015

दिखावा क्यों करना?




श्री साई सच्चरित्र में एक जगह उल्लेख आता है कि बाबा के कीर्तनकार गणपतराव दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे जो बाद में दासगणु महाराज के नाम से जाने गए, एक दफे बाबा के कीर्तन करने निकलने ही वाले थे जब बाबा की नज़र उन पर पड़ी. ज़रीदार कुरता, अचकन, सर पर पगड़ी और रेशमी धोती पहने दासगणु महाराज को बाबा ने मुस्कुराकर पूछा कि वे दूल्हे की तरह सज कर कहाँ जा रहे हैं. उनका अभिप्राय जानकार बाबा ने उनसे कहा कि एक कीर्तनकार को ऐसे सज-धज कर कीर्तन करना शोभा नहीं देता और उन्हें अपने आचरण में सादापन लाना चाहिए. दासगणु महाराज ने तुरंत बाबा की आज्ञा का पालन किया और बिना देर अपना हुलिया बदल लिया. उसके बाद हाथ में करताल, गले में माला और सादी सूती धोती पहने दासगणु महाराज जब भी कहीं कीर्तन करने जाते तो भक्तों के बीच में एक कुर्सी पर बाबा की एक फोटो लगा लेते. उनका यश बढ़ने लगा, मान होने लगा. उनके गाये भजनों से भक्तों के बीच बाबा के दर्शनों को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी. कहा जाए तो साई बाबा की ख्याति को बढ़ाने में जितना नानासाहेब चांदोरकर का हाथ था उतना ही दासगणु महाराज के भजनों का भी. बाबा की ली हुई चुटकी के बाद दासगणु महाराज दिखावे के दलदल से निकल आये और दूसरों को अच्छा दिखाने की ललक से ऊपर उठ एक नया और ऊंचा स्थान सादगी के माध्यम से पा लिया जो शायद दिखावे की ज़िन्दगी में उन्हें नहीं मिल पाता.

हमारे वर्तमान समाज में बाबा की यही सीख आज भी प्रासंगिक है. हम लोग सादगी का आचरण छोड़ कर दिखावे की बनावटी ज़िन्दगी जीने लग पड़े हैं. कपड़े-लत्ते, खान-पान, रहन-सहन..सभी में हमें दिखावा करना अधिक भाता है. हर पल, हर घडी, हर लम्हा हम सभी एक बनावटी जीवन जीते हैं. दूसरों से अधिक और दूसरों से जल्दी पाना चाहते हैं. दिखावा चाहते हैं. दूसरे से अपने आप को बेहतर और अधिक संपन्न दिखाना चाहते हैं.

इसी फेर में संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं और हम सब आत्म-केन्द्रित होने लगे हैं. यह एक अंधी होड़ है जिसमें जल्द ही हमारी सांस घुटने लगती है. इस होड़ में हम इतना अधिक और जल्दी टूटने लगे हैं कि अन्दर के उठते शोर को कम करने के लिए जम कर ज़ोर-ज़ोर से बजते म्यूज़िक पर छद्म आभास देनी वाली रंग-बिरंगी रौशनी के बीच वाईन के गिलास हलक से नीचे उतारते हुए सब कुछ भूल जाना चाहते हैं. इस छलावे की भूल-भुलैया में नशे में धुत्त, डूबते-उतरते ये भूल जाते हैं कि इन सब के ख़त्म हो जाने पर उसी दुनिया से वाबस्ता होना है जो सुरसा की तरह मुंह खोले वहीँ खड़ी है जहां से हमने उससे दूर जाना चाहा था. ये ऐसी दौड़ है जिसमें हारना तय है. अपने आप से भी और दुनिया से भी. दिखावे की दुनिया में रहते-रहते हम अपनी पहचान भूल जाते हैं.

कई बार वक़्त आईना दिखाता भी है तो हम डर कर उससे दूर भागने लगते हैं कि अपना चेहरा हम उसमें कैसे देखें! मन की शांति भंग हो जाती है. मान-मर्यादा छितर सी जाती है. परिवार बिखरने लगता है. अपने पराये लगने लगते हैं और परायों में अपनापन ढूंढते हैं. इस होड़ में सब पिछड़ने लगता है. जिसे पाने के लिए ये सब किया वो अर्थहीन सा लगता है. जिस सुख को पाने के लिए ये जद्दोजहद की थी वो तो सुख था ही नहीं. मन उदास, शरीर बेदम, सांस उखड़ी सी, आँखें सूनी. क्या यही पाने की दौड़ थी? उदास मन को राह मिलती नहीं.

बाबा की सीख अँधेरे में उजाले की आस जगाती है. भजन में जाना है तो ये दिखावा किस के लिए? दुनिया के आगे खुद को दूसरों से बेहतर बनाने के इस भंवर में डोलते हम भूल चुके होते हैं कि जीवन तो अपने आप में ही एक भजन है जिसमें सुख का सुर, शांति की लय और आनंद की ताल मिलने से ही जीवन संपन्न होता है. कुछ भी ऊपर नीचे हुआ तो ये भजन बेसुरा, बिना लय और बेताला हो जाता है. सब कुछ गड़बड़. औरों की देखा-देखी कर उनसे ताल मिलाने के फेर में हमारा सुरीला भजन कब बेसुरा हो जाता है, पता ही नहीं चलता. सुरों में सादगी, लय का सुखद प्रवाह, ताल की एकरूपता और प्रेम का भाव इस भजन को सम्पूर्ण आनंदमयी अनुभूति बना देते हैं.

जीना है तो दूसरों के लिए लेकिन दूसरों को दिखाने और उनसे होड़ के लिए नहीं. साई के जीवन-पुष्प से ये एक पंखुड़ी हमारे जीवन को महकाने के लिए काफ़ी है.


बाबा भली कर रहे..

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभम भवतु.

मर्यादा में रहना सिखाते साई



श्री साई सच्चरित्र में बाबा का तत्त्वों पर नियंत्रण करते हुए उल्लेख है शिरडी में एक बार जब बादलों ने मर्यादा छोड़ दी और मूसलाधार बारिश होने से पूरा शिरडी गाँव तर-बतर हो गया, कमर तक पानी भर गया, पशु-पक्षी बेहाल हो गए और नर-नारियों में हाहाकार मच गया तब बाबा ने क्रोधित होकर गर्जना करते हुए बादलों से होने वाली अतिवृष्टि को रुक जाने के लिए कहा और बादलों ने तुरंत अपना रुख बदल लिया था. ऐसे ही एक और किस्से का उल्लेख आता है जब मस्जिद में प्रज्ज्वलित धूनी में अग्नि ने एकदम प्रचण्ड रूप धारण कर लिया था और उसकी लपटें मस्जिद की छत तक पहुँचने लगी थी. लोगों को लगने लगा था कि अब बस कुछ ही देर में मस्जिद जल कर ख़ाक हो जायेगी. भयभीत भक्तों ने तब बाबा से कुछ करने को कहा और बाबा ने अपना सटका ज़मीन पर मारकर ज़ोर से उन लपटों को शांत हो जाने के लिए कहा और लपटें तुरंत सिमट कर वापस धूनी की मर्यादा में सिमट गयीं. क्या ये सिर्फ चमत्कार है? क्या बाबा की मंशा इन दो अवसरों पर भक्तों को केवल अपनी अलौकिक शक्तियों से चमत्कृत कर देने की थी या हममें कुछ संस्कार भी डालने कि थी? अगर देखा जाये तो हर चमत्कार के पीछे बाबा का उद्देश्य अपने भक्तों को केवल संस्कारित करने का था जिससे हम अपना व्यक्तित्व निखार सकें और बाबा की राह पर चल सकें.

धर्म का मूल अर्थ है मर्यादा में रहना. संसार में जितनी भी वस्तुएं – जड़ और चेतन - है वो जब तक अपनी मर्यादा में रहें तब तक वो धर्म का आचरण कर रहीं मालूम पड़ती है लेकिन जैसे ही वो अपनी मर्यादा छोड़ देती हैं, अधर्म के पथ पर चल निकलती हैं. धरती अपनी मर्यादा छोड़ दे तो भूकंप आने से जान और संपत्ति की क्षति हो जाती है. नदी अपनी मर्यादा छोड़ दे तो बाढ़, समुद्र छोड़ दे तो सुनामी, ऋतुएँ छोड़ दे तो अल्पवृष्टि या अतिवृष्टि. मनुष्य मर्यादा छोड़ दे तो पतन की राह पर चल निकलता है. शिक्षक अपनी सीमाएं छोड़ दे तो संस्कार टूटने लगते हैं. राजा के धर्म छोड़ने से प्रजा विचलित हो उठती है. हमारे नेता अगर अपना धर्म छोड़ दें तो भ्रष्टाचार बढ़ जायेगा. न्याय-पालिका के ध्वस्त होने से व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं. पुलिस अपना कार्य छोड़ दे तो रक्षा तंत्र बिखर जाता है. अफ़सर के भ्रष्ट होने से काम-काज ठप्प हो जाता है और माता-पिता अगर अपना धर्म भूल जायेंगे तो पूरी की पूरी पीढ़ी बिखर जाएगी. शरीर अपना धर्म भूल जायेगा तो बीमारियाँ घेर लेंगी. कुल मिलाकर जहाँ भी धर्म पालन में मर्यादा का उल्लंघन हुआ, वहीँ पर पूरा तंत्र ध्वस्त हो जाता है.

हम सभी से, चाहे हम राजा हो या प्रजा, मर्यादा में रहना अपेक्षित है ही. जब भी हममें से कोई इसमें जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे चूक करता है तो हम किस व्यवस्था को कहाँ तक नुकसान पहुंचा रहे हैं, इसका आकलन कर पाना बहुत मुश्किल है.

साई बाबा की जीवन लीलाओं का वाचन-श्रवण और फिर मनन करने से जीवन में अपने पथ से डिगता धर्म मर्यादा के केंचुल में समा जाता है और फिर जागृत हो उठता है. उसका स्पंदन फिर से प्रारम्भ हो उठता है. एक गुरु के रूप में साई ने अपने जीवन-सूत्रों से बिना अस्त्र-शस्त्र के अपने भक्तों में संस्कार रूप में धर्म और मर्यादा के संस्थापन का कार्य किया है. इसके लिए वे अगर बिना बात के किसी पर क्रोधित भी हुए और अपशब्दों का प्रयोग किया तो इसका मतलब ये कतई नहीं है कि साई ऐसा द्वेषवश करते थे. गुरु, शिक्षकमाता-पिता का गुस्सा तो अमृत रूप होता है. इस क्रोध कि मंशा किसी को ठेस पहुँचाने की नहीं बल्कि सामने वाले को इस बात का अहसास कराने के लिए थी कि कहीं तुम मर्यादा भूल रहे हो. बाबा का गुस्सा तुरंत शांत भी हो जाता था और अगले ही पल वो विनोद करने लगते थे. समुद्र की लहरों जैसा था बाबा का गुस्सा. ऊपर हलचल और नीचे अथाह शांति. गुस्से को अगर गिरह बाँध कर रखोगे तो जल्द ही बीमारियाँ घेर लेंगी.

जब-जब भी जीवन में उथल-पुथल होती दिखे तो समझो कि हमने कहीं अपनी मर्यादा उलांघी है और बाबा ने हमें इस बात का संकेत दे दिया है. इस संकेत को पकड़ कर चलो तो फिर जीवन ख़ुश-खुशहाल हो उठेगा. आनंद के द्वार खुल जायेंगे.

बाबा भली कर रहे..
श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभम भवतु.
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Sunday, 30 August 2015

साई से मांगते क्या हो..

साई बाबा के चमत्कारों से चमत्कृत उनके भक्त साई बाबा को भगवान ही मानते हैं. भगवान के रूप में सद्गुरु. भगवान के रूप में मित्र या सखा. भगवान के रूप में ही रक्षक. भगवान के रूप में एक अवतार.

भगवान की व्याख्या करने बैठें तो महसूस होगा कि भगवान आमतौर पर हम उन्हें मानते हैं जो सर्वशक्तिमान हैं और जिन्हें पूजने से बिगड़ी परिस्थितियां बन जाती है. अपने मतलब की बात हमें बड़ी जल्दी समझ में आती है. हम अपनी महत्त्व बुद्धि के चलते ये भी समझ जाते हैं कि किसे पूजने में हमारा फायदा है, कौन हमारी जल्दी सुन लेगा और इसी कारण से हम उन्हें पूजने भी लगते हैं. वो तो दयालु हैं. सुनते ही प्रेम और करुणावश पसीज जाते हैं. लेकिन फिर जब कभी ऐसा भी हो कि हमारे मन की उन्होंने नहीं सुनी या फिर हमारी मन-मर्ज़ी के हिसाब से हमारा काम नहीं बनाया तो फिर हम कोई दूसरा आराध्य ढूंढ लेते हैं.


पूजा का स्वार्थ से गहरा नाता है. स्वार्थ जितना दुष्कर, पूजा उतनी ही लम्बी. हमारी हथेलियाँ जुडती भी हैं तो लब पर दुआ होती है और दिल में चाहत. हे भगवान! या ख़ुदा! ओ’ गॉड! वाहेगुरु! मेरा काम बना दे. और क्यों न हो! हमारी अपनी सीमाएं होती हैं, अपनी कमज़ोरिया हम अच्छे से समझते हैं. इसीलिए तो ज़्यादातर भक्त भगवान से धन-दौलत, संतान, भौतिक सम्पदा, कोर्ट-कचहरी में सफलता, विवाह, नौकरी, इत्यादि ऐसी ही चीज़ों की मांग करते हैं. हम में से कुछ समझदार तो भगवान से सौदेबाज़ी भी कर लेते हैं. “इतने गुरुवार उपवास रखूँगा”, “सवा रुपये का प्रसाद अर्पण करूंगी”, “मेरा काम हो जाए तो इतने पैसे तेरे खजाने में डालूँगा”, “इतने सोमवार जल चढ़ाने आऊँगी”, वगैरह..

क्या मेरा साई, मेरा भगवान इन सब का भूखा है? क्या वो सौदेबाज़ है कि आप अगर उसे कुछ चढ़ा देंगे तो वो आपका ऐसा काम भी कर देगा जो अनीतिगत है या कुछ ऐसा भी आपको दे देगा जिस पर आपका कोई अधिकार ही नहीं है? साई तो भाव का भूखा है. वो तो आपके भाव देखता है. कभी ऐसा भी कह कर देखिएगा साई से कि आपका काम हो या न हो आप उसके दर पर माथा टेकेंगे, या आप इतने बेबस और लाचारों की मदद करेंगे. साई से शर्त मत लगाओ. काम हो या न हो, जो संकल्प मन से किया है, उसे पूर्ण करना. फिर देखो मेरे साई का जलवा. जो तुम्हारी किस्मत में है वो तो मिलकर रहेगा, मेरे साई ने कृपा बरसा दी तो वो भी मिल जायेगा जो तुम्हारी किस्मत में नहीं है. वो तुम्हारा समर्पण देखता है.
जो पैसे तुम चढ़ाने की बात कर रहे हो, मत भूलो कि, वो तो तुम्हे उसकी कृपा से ही मिले हैं. तुम उसे क्या दोगे और कितना दोगे? जब उसकी कृपा मिल जाती है तो वो हमें हमारी औकात से कहीं ज़्यादा देता है. हमारी झोलियाँ छोटी पड़ जाती हैं. हमारे साथ दिक्कत ये है कि हम अपने हिसाब से मांगते हैं और वो अपने हिसाब से देने को आतुर बैठा है. जो वो देना चाहता है, हम मांगते ही कब है!  

बार-बार कुछ तुच्छ मांगने से अच्छा है कि उससे सिर्फ इतना ही कहें कि साई, तुझे मालूम है कि मेरे लिए क्या अच्छा है. जो तुझे ठीक लगे वो कर देना. अगर तकलीफ़ देनी ही हो तो मेरा हाथ मत छोड़ना. वज़न देना ही हो तो पीठ मज़बूत कर देना. अगर तेरी कृपा और साथ से, मैं इन सब से निकलकर एक बेहतर इंसान बन सकता हूँ, तो बेशक मैं तेरी शरणागत हूँ. तू जो चाहे मेरा करे. मेरा साथ कभी मत छोड़ना. तेरा हाथ हमेशा मेरे सिर पर रहे. अपने गले से लगा कर रखना. मैं कभी फिसलूँ भी तो मुझे थाम लेना. तेरी राह मैं कभी न छोडूं.

वो भी तुम्हे छोड़ना नहीं चाहता. कभी उस पर, अपने भाव पर भरोसा तो रखकर देखो! फिर देखो कि साई क्या और कैसे करता है. तुम्हारी चिंताएँ हर लेगा. तुम्हे पलकों में सजाकर रखेगा. बिन मांगे तुम्हे वो सब देगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी. और फिर जब वो ये परख लेगा कि उसकी इन सब रहमतों के बाद भी तुम नहीं बदले हो तो वो तुम्हे अपना स्वरुप भी दे देगा. प्रेम, करुणा, विवेक, सदाचरण, परमार्थ की प्रेरणा और सामर्थ्य, धीरे-धीरे तुम्हारी झोली में आकर गिरने लगेंगे. यह सब तो तुमने नहीं माँगा था. स्वार्थी से परमार्थी बन जाओगे. बस अपनी मांगो का स्वरुप बदल दो और उसमें विश्वास रख, सब्र से काम लो.

मेरा साई तो देने के लिए ही बैठा है..

बाबा भली कर रहे..

साई से मांगते क्या हो..




बाबा की बातें करते-करते, श्री साई अमृत कथा में सुमीत पोन्दा ‘भाईजी’ बताते हैं कि साई बाबा के चमत्कारों से चमत्कृत उनके भक्त साई बाबा को भगवान ही मानते हैं. भगवान के रूप में सद्गुरु. भगवान के रूप में मित्र या सखा. भगवान के रूप में ही रक्षक. भगवान के रूप में एक अवतार.

भगवान की व्याख्या करने बैठें तो महसूस होगा कि भगवान आमतौर पर हम उन्हें मानते हैं जो सर्वशक्तिमान हैं और जिन्हें पूजने से बिगड़ी परिस्थितियां बन जाती है. अपने मतलब की बात हमें बड़ी जल्दी समझ में आती है. हम अपनी महत्त्व बुद्धि के चलते ये भी समझ जाते हैं कि किसे पूजने में हमारा फायदा है, कौन हमारी जल्दी सुन लेगा और इसी कारण से हम उन्हें पूजने भी लगते हैं. वो तो दयालु हैं. सुनते ही प्रेम और करुणावश पसीज जाते हैं. लेकिन फिर जब कभी ऐसा भी हो कि हमारे मन की उन्होंने नहीं सुनी या फिर हमारी मन-मर्ज़ी के हिसाब से हमारा काम नहीं बनाया तो फिर हम कोई दूसरा आराध्य ढूंढ लेते हैं.


पूजा का स्वार्थ से गहरा नाता है. स्वार्थ जितना दुष्कर, पूजा उतनी ही लम्बी. हमारी हथेलियाँ जुडती भी हैं तो लब पर दुआ होती है और दिल में चाहत. हे भगवान! या ख़ुदा! ओ’ गॉड! वाहेगुरु! मेरा काम बना दे. और क्यों न हो! हमारी अपनी सीमाएं होती हैं, अपनी कमज़ोरिया हम अच्छे से समझते हैं. इसीलिए तो ज़्यादातर भक्त भगवान से धन-दौलत, संतान, भौतिक सम्पदा, कोर्ट-कचहरी में सफलता, विवाह, नौकरी, इत्यादि ऐसी ही चीज़ों की मांग करते हैं. हम में से कुछ समझदार तो भगवान से सौदेबाज़ी भी कर लेते हैं. “इतने गुरुवार उपवास रखूँगा”, “सवा रुपये का प्रसाद अर्पण करूंगी”, “मेरा काम हो जाए तो इतने पैसे तेरे खजाने में डालूँगा”, “इतने सोमवार जल चढ़ाने आऊँगी”, वगैरह..

क्या मेरा साई, मेरा भगवान इन सब का भूखा है? क्या वो सौदेबाज़ है कि आप अगर उसे कुछ चढ़ा देंगे तो वो आपका ऐसा काम भी कर देगा जो अनीतिगत है या कुछ ऐसा भी आपको दे देगा जिस पर आपका कोई अधिकार ही नहीं है? साई तो भाव का भूखा है. वो तो आपके भाव देखता है. कभी ऐसा भी कह कर देखिएगा साई से कि आपका काम हो या न हो आप उसके दर पर माथा टेकेंगे, या आप इतने बेबस और लाचारों की मदद करेंगे. साई से शर्त मत लगाओ. काम हो या न हो, जो संकल्प मन से किया है, उसे पूर्ण करना. फिर देखो मेरे साई का जलवा. जो तुम्हारी किस्मत में है वो तो मिलकर रहेगा, मेरे साई ने कृपा बरसा दी तो वो भी मिल जायेगा जो तुम्हारी किस्मत में नहीं है. वो तुम्हारा समर्पण देखता है.
जो पैसे तुम चढ़ाने की बात कर रहे हो, मत भूलो कि, वो तो तुम्हे उसकी कृपा से ही मिले हैं. तुम उसे क्या दोगे और कितना दोगे? जब उसकी कृपा मिल जाती है तो वो हमें हमारी औकात से कहीं ज़्यादा देता है. हमारी झोलियाँ छोटी पड़ जाती हैं. हमारे साथ दिक्कत ये है कि हम अपने हिसाब से मांगते हैं और वो अपने हिसाब से देने को आतुर बैठा है. जो वो देना चाहता है, हम मांगते ही कब है!  

बार-बार कुछ तुच्छ मांगने से अच्छा है कि उससे सिर्फ इतना ही कहें कि साई, तुझे मालूम है कि मेरे लिए क्या अच्छा है. जो तुझे ठीक लगे वो कर देना. अगर तकलीफ़ देनी ही हो तो मेरा हाथ मत छोड़ना. वज़न देना ही हो तो पीठ मज़बूत कर देना. अगर तेरी कृपा और साथ से, मैं इन सब से निकलकर एक बेहतर इंसान बन सकता हूँ, तो बेशक मैं तेरी शरणागत हूँ. तू जो चाहे मेरा करे. मेरा साथ कभी मत छोड़ना. तेरा हाथ हमेशा मेरे सिर पर रहे. अपने गले से लगा कर रखना. मैं कभी फिसलूँ भी तो मुझे थाम लेना. तेरी राह मैं कभी न छोडूं.

वो भी तुम्हे छोड़ना नहीं चाहता. कभी उस पर, अपने भाव पर भरोसा तो रखकर देखो! फिर देखो कि साई क्या और कैसे करता है. तुम्हारी चिंताएँ हर लेगा. तुम्हे पलकों में सजाकर रखेगा. बिन मांगे तुम्हे वो सब देगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी. और फिर जब वो ये परख लेगा कि उसकी इन सब रहमतों के बाद भी तुम नहीं बदले हो तो वो तुम्हे अपना स्वरुप भी दे देगा. प्रेम, करुणा, विवेक, सदाचरण, परमार्थ की प्रेरणा और सामर्थ्य, धीरे-धीरे तुम्हारी झोली में आकर गिरने लगेंगे. यह सब तो तुमने नहीं माँगा था. स्वार्थी से परमार्थी बन जाओगे. बस अपनी मांगो का स्वरुप बदल दो और उसमें विश्वास रख, सब्र से काम लो.

मेरा साई तो देने के लिए ही बैठा है..

बाबा भली कर रहे..

व्यर्थ है खोज गुरु की..


“जाना है तो ऊपर जाओ. मार्ग दुर्गम है. रास्ते में सिंह और भेड़िये भी मिलते हैं
लेकिन अगर पथ-प्रदर्शक साथ में हो तो फिर चिंता की कोई बात नहीं.
वह तुम्हे गड्ढों से बचाते हुए अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचा देता है.”

उपरोक्त बातें बाबा ने श्री दाभोलकर की उपस्थिति में एक अन्य भक्त से तब कहीं थीं जब अपने ज्ञान, पद और उपलब्धियों के अहंकार में चूर, श्री दाभोलकर बालासाहेब भाटे से गुरु की आवश्यकता विषय पर व्यर्थ विवाद करने के बाद उनके साथ मस्जिद में आरती हेतु गए थे. प्रश्न गुरु की खोज का नहीं है. गुरु की खोज करने से तब तक कोई भी लाभ नहीं होता जब तक हम शिष्य बनने के लिए तत्पर न हों. आवश्यकता तो है अपने अन्दर शिष्यत्व पैदा करने की. किसी पथ-प्रदर्शक के अधीन हो जाने की इच्छा को स्वयं से प्रगट करना ये शिष्यत्व का मूल है. स्वतंत्र होने के लिए पराधीन होने की इच्छा होनी चाहिए. जब हम यह मान लेते हैं कि हमें कुछ नहीं पता और हम बिन पतवार की नांव की तरह भटक रहे हैं और हमें किसी ऐसे हाथ की, मांझी की ज़रुरत है जो हमें किनारे लगा दे, तब हम यह मान सकते हैं कि हमारे अन्दर शिष्यत्व का भाव पैदा हो रहा है और हम अपना अहंकार और दंभ छोड़कर किसी गुरु के अधीन हो जाने के लिए अब तैयार हैं, तब हमें अवश्य ही गुरु मिल जाते हैं. जब हम अपने संशयों, अभिमान, अहंकार, हेंकड़ी से मुक्त होने के लिए अपने आप को तैयार कर लेते हैं तब गुरु मिल ही नहीं जाते हैं, भगवान स्वयं सद्गुरु का रूप लेकर हमारे सामने आ खड़े होते हैं.

गुरु ऐसे अपने अन्दर हमें ऐसे समो लेता है जैसे एक माँ अपने बच्चों को अपने आँचल में छुपा लेती है. उसके विशाल पंखों के नीचे हमें एक नया आसमान मिलता है. उसके बताये हुए रास्ते पर चलने से हम नित नए कीर्तिमान रचते हैं. उसकी करुणा को अपने अन्दर समाहित कर लेने से हम अपने साथ-साथ दूसरों का भी उद्धार करने को तत्पर हो उठते हैं. उसकी ऊँगली के एक इशारे से जीवन को एक नयी दिशा मिल जाती है. उसकी आँखों में प्रतिपल उमड़ता वात्सल्य हमारे असंवेदनशील हो चुके मानस में नए प्राण फूंकता है. उसके दुलार से हमारा विवेक फिर स्पंदन करने लगता है. उसकी सुरक्षा में हम हर पल अपने आप को आविष्कृत करते रहते हैं. दिने-दिने नवं-नवं.. हर रोज़ नए-नए. इतने सुन्दर कि अपना काया-कल्प देख हम अपने गुरु की शक्ति पर मोहित हो उठें. गुरु हमें बदल डालते हैं. साई हमें इस हद तक बदल डालते हैं कि हमें अपने ही बदले स्वरूप पर आश्चर्य हो उठता है. फिर एक समय ऐसा भी आता है जब हम गुरु के गुणों को अपने अन्दर इतना समाहित कर लेते हैं कि उनसे भिन्नता संभव ही नहीं होती.

क्यों चाहिए गुरु? पैदा होने के बाद हम हमेशा हर कार्य कभी न कभी पहली बार करते हैं. सही गुरु के अभाव में उस कार्य को करते हुए हम अपने आप को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं. गुरु समय-समय पर अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आता है. कभी माता तो कभी पिता बन कर. कभी भाई या बहन तो कभी पत्नी या मित्र बनकर. कृष्ण ने तो राधा को भी गुरु के समतुल्य माना है. हमारे आचार्य, शिक्षक सभी हमारे गुरु ही हैं. हमारे बच्चे भी हमारे गुरु बन सकते हैं तो हमारे अधीनस्थ काम करने वाला भी हमें सही राह दिखा सकता है. ज़रुरत है कि हम जिज्ञासु बने. अपने ऊपर चढ़े हुए तमाम खोलों को निकाल फेंकने का साहस रखें. यह मानने के लिए तैयार रहें कि हमें सीखने की ज़रुरत है. हाथ में आपके प्रश्न का उत्तर लेकर गुरु आपके सामने होगा. जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर गुरु अलग-अलग स्वरुप में हमारी सहायता के लिए हमेशा खड़ा मिलेगा लेकिन जहाँ शिष्य ने गुरु की काबिलियत पर संदेह किया या अपने आप को उससे बेहतर मानने या दिखाने की कोशिश भी की तो हम अपना शिष्यत्व खो बैठते हैं. गुरु चला जाता है. ज्ञान-रुपी पानी का बहाव रुक जाता है और रुके हुए पानी में काई जमा होने लगती है. बदबू उठने लगती है. स्वरुप बिगड़ जाता है. फिसलन होने लगती है, पतन का डर पैदा हो जाता है.

श्री साई सच्चरित्र में बाबा ने श्री दाभोलकर के माध्यम से लिखा है कि शिष्य तीन प्रकार के होते हैं. साधारण शिष्य वो जो पग-पग पर गुरु की अवहेलना करते हैं और जीवन में दुखी होते हैं. मध्यम शिष्य वो जो गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए आगे बढ़ते चलते हैं और उत्तम शिष्य वो जो गुरु की मंशा को बिन बोले ही समझ लेते हैं और विश्व को नयी दिशा देते हैं.

शिष्य ही गुरु को परिभाषित करते हैं और उसे महान बनाते हैं क्योंकि गुरु में तो ख़ुद महान बनने की कोई लालसा होती ही नहीं है. विश्वमित्र ने राम को, सान्दिपनी ने कृष्ण को और अनजान, अनाम गुरु ने साई को गढ़ा और अपने शिष्य की महानता की रौशनी में ऐसे खो गए जैसे माचिस की तीलि यज्ञ की अग्नि को प्रज्ज्वलित करते हुए अपना अस्तित्व खो देती है.

विनम्र शिष्यत्व ही महान गुरुत्व को सच्ची आदरांजलि है. 

                      बाबा भली कर रहे..
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Saturday, 29 August 2015

हर हार में जीत होती है..

जीवन में हार और जीत साथ-साथ चलते हैं. हार के बाद जीत और जीत के साथ हार लगे ही रहते हैं. जीवन के हर पहलू में ये दोनों साथ-साथ या फिर आगे-पीछे तो ज़रूर मिलते, चलते हैं. जीवन हर पल बदलता रहता है. स्याह अँधेरे के बाद उजाला होता है यह सृष्टि का नियम है और जब रात बहुत गहरी हो जाए तो मानना चाहिए कि उजाला पास ही है; सूरज बस उगने ही वाला है. प्रकृति का नियम है कि सूरज उगने पर सवेरा होता है न कि सवेरा होने पर सूरज उगता है. ठीक वैसे ही जैसे उत्कंठा के उत्पन्न होने पर ही ज्ञान प्रकट होता है न कि ज्ञान के प्रकट होने पर उत्कंठा उत्पन्न होती है. प्यास लगने पर ही हम पानी को खोजते हैं.

रात और सुबह का जो संधिकाल होता है उसे ‘कल्य’ कहा जाता है. इसी से बना है शब्द ‘कल्याण’. इसी तरह अँधेरे से उजाले की ओर हमारे सफ़र की शुरुआत ही हमारे कल्याण के मार्ग को खोलती है. हमारा भला होने की शुरुआत यहीं से होती है. अपनी ही लगाई हुई बाज़ी में अपने ही हाथों हुई अपनी हार को जीत में बदलने की कोशिश यहीं से शुरू होती है. वो पल, जब हमें यह अहसास होता है कि अब हमें अँधेरे से निकलना है और उजाले की ओर बढ़ना है, यही वो समय होता है जब हम अपने आप को खोजने की शुरुआत करते हैं.


क्या होती है ये हार और जीत? जब हम किसी भी काम के अंजाम को, उसके परिणाम को अपनी सोच या चाहे अनुसार पा लेते हैं तो हमें जीत का अहसास होता है. और जब ये परिणाम हमारी सोच के उलट आता है तब हमें हार का अहसास होता है. कर्म का मूल सिद्धांत हम बार-बार भूल जाते हैं कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं है और इसीलिए हमें आसक्ति रखनी हो तो सिर्फ कर्म तक ही रखें, परिणाम में आसक्ति रखने से हम दुःख की बुनियाद रख रहे होते हैं. हमारे किसी भी कर्म का परिणाम हमारे लाख सर पटकने से भी हमेशा हमारे चाहे अनुसार आये ये कतई संभव नहीं है.

कहा भी तो गया है, “मन का हो तो अच्छा. न हो तो और भी अच्छा!” क्योंकि जो तब होता है वो हमारे मन का न होकर के साई के मन का होता है और वो कभी भी हमारा बुरा नहीं चाहता या होने देता. सिर्फ उसमें पूर्ण श्रद्धा रख, सब्र से काम लेना चाहिए. इससे हार होने पर दुःख की अनुभूति आहत कर, दुखी नहीं करेगी और जीत होने पर हमें अहंकार के पंख नहीं लग जायेंगे. हार होने पर भी जब हम उसका शुक्र मनाते हैं तब हम हार को हराते हैं. इसी तरह, जब हम अपनी जीत में ख़ुद श्रेय न लेकर कर साई का शुक्रिया अदा करते हैं तो हम अपनी जीत उसे समर्पित कर रहे होते हैं. तब हम जीत को जीत लेते हैं. हार को हराना और जीत को जीत लेने में ही जीवन के अँधेरे से उजाले के सफ़र का सार है.

पराजय जिसे तोड़ नहीं सकती और विजय जिसको डिगा नहीं सकती वो साई का सच्चा भक्त होता है. साई ने भी तो हार का स्वाद चखा था. श्री साई सच्चरित्र में उल्लेख आता है कि शिरडी में अपने शुरूआती दिनों में बाबा एक पहलवान की तरह रहते थे. उनके लम्बे बाल थे और शरीर बलिष्ठ. उन्हें मोहिनुद्दीन नाम के एक पहलवान ने कुश्ती के लिए ललकारा. लिखा है कि बाबा इस कुश्ती में हार गए थे. इस हार के बाद बाबा की जीवन शैली बदल गई थी. अब वो लम्बी कफनी पहनने लगे थे. बाल छोटे हो गए थे. अब वो अपनी अनोखी चिकत्सीय विधा से शिरडीवासियों की सेवा में लग गए थे. यहीं से उन्होंने आमजन को अपनी सेवा का साधन बनाया.

सवाल यह उठता है कि जब बाबा ईश्वर हैं और उनके पास तो हमारे जैसे भक्तों के सितारे बदलने की भी अदम्य शक्ति है तो यह कैसे संभव हैं कि वो एक आम पहलवान से हार जायें! यहाँ हमें यह समझना होगा कि बाबा शिलधि (शिरडी का मूल नाम) नाम के इस स्थान के बल से मनुष्य योनी में यहाँ खिंचे चले आये और इस पुण्य-भूमि को उन्होंने संवारने का काम शुरू कर दिया. यह उनका प्रारब्ध था. इस मानव रूप में उनकी तपस्या शुरू हो गयी थी जिसमे उनको एक साधारण मनुष्य की तरह तप कर, एक मिसाल अपने भक्तों के सामने रखनी थी. कुश्ती में हुई उनकी यह हार उनके इस मानव रूपी जीवन का निर्णायक मोड़ बनी जहां से उनकी आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खुले और इसीसे हमारे और आपके जैसे साधारण मानव आलोकित होने लगे. इस अवतार में कुश्ती में मिली हार उनका मनोबल तोड़ नहीं पायी बल्कि इसी हार ने उनके जीवन को एक नयी दिशा दी. मोहिनुद्दीन से हारे इस शरीर को अब वो परमपिता के ध्येय, मानव जाती के उत्थान में लगा चुके थे. उन्होंने हार को हरा दिया था. अब वो जीत को जीतने चल पड़े थे.

बाबा के नाम में जो विश्वास रखते हैं उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी हर हार में जीत है. ग़म के बादल छाए तो हम मुस्कुराते रहें. अपने मन में आशाओं के दीप हमेशा प्रज्ज्वलित रखें. आज जो बिगड़ा है, वो कल जरूर बनेगा. जो आज रूठा बैठा है, वो नसीब कल ज़रूर मनेगा. साई के नाम में प्रगाढ़ विश्वास रखो. हर हार एक नयी जीत की इबारत है. हर अँधेरा उजाले की निशानी है.         
 


                      बाबा भली कर रहे..

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सम्हाल लेते हैं साई..



सदेह रहते हुए साई ने लोगों के दुखों को दूर कर उन्हे सुख के मार्ग पर डाला, उनके पापों का क्षय किया, उन्हें सत्य के मार्ग पर प्रशस्त किया. समाधि लेने के बाद उन्होंने अपने में विश्वास करने वालों को इस दुनिया की दुःख-तकलीफों के अहसास से दूर किया और ऐसी मनोस्थिति में ला कर रख दिया जहाँ दुःख होने पर भी उनका भक्त दुखी नहीं होता और सुख होने पर आसमान में उड़ने नहीं लगता. साई आज भी जीवित हैं. साई को इसीलिए तारणहार भी कहा जाता है क्योंकि उनका सान्निध्य, उनका साथ, उनकी छत्र-छाया हमें अपने बुज़ुर्ग-सी लगती है जिनके मन में हमारे लिए सिर्फ प्रेम और सद्भावना भरी रहती है. वे सिर्फ और सिर्फ हमारे उद्धार के लिए ही चिंतित होते हैं. उन्हें हमेशा हमारे भले की चिंता रहती है. 

बाबा ने कहा भी तो है..
मुझे सदा जीवित ही जानो,
अनुभव करो, सत्य पहचानो.

साई निरंतर, नित्य और शाश्वत सत्य हैं. ऐसा सत्य जो किसी भी कोण से, कहीं से भी, देखने पर बदलता नहीं है. साई तब भी थे जब हम और आप नहीं थे. आज जब हम और आप हैं तो भी साई हैं. कल जब हम न होंगे तब भी साई होंगे.  जब मेरे और आपके पास कुछ भी नहीं था तब भी साई थे और अगर कुछ ना होता तो भी साई होते. आज जब सब कुछ है तो भी साई हैं क्योंकि साई मेरे और आपके विश्वास में बसते हैं. चीज़ों और अहसासों के होने या मिटने से साई रहने और मिटने वाले नहीं हैं.

पहले थोडा-बहुत, फिर कुछ और, और उसके बाद बहुत कुछ मांगने और पाने के फेर में हम यह भूल जाते हैं कि हम साई से तो मांग रहे हैं लेकिन साई से दूर होते जा रहे हैं. दूर.. हम होते हैं. साई तो वहीँ हमारे विश्वास में, हमारे अवचेतन में बैठे मुस्कुराकर हमारे बचपने को देखते रहते हैं. हम साई का सिंहासन बदल डालते हैं उन्हें विश्वास से उठाकर अपनी मांगो पर बिठा देते हैं. अब साई को हम अपने विश्वास में न देखकर अपनी मांगो में देखते हैं. साई से मांगते-मांगते हम भूल जाते हैं कि उससे पाने की चाहत में हम उसे ही खोते जा रहे हैं. हम साई को तो मानते हैं लेकिन साई की सुनना बंद कर देते हैं. जानबूझ कर अनजान बनते जाते हैं. खुली आँखों से वही देखते हैं जो हमें देखना होता है लेकिन वो नहीं जो साई हमें दिखाना चाहते हैं. साई से दूर होते-होते हम न जाने कब ख़ुद से भी दूर हो जाते हैं. ख़ुद को पहचानना बंद कर देते हैं.

फिर शुरू होता है दर्द का अहसास जो महसूस तो होता है पर समझ में नहीं आता. दुःख, संशय, डर, शोक, चिंताएं घेर लेते हैं. अनजाने और अनकहे के प्रश्नचिह्न हम ओढ़ लेते हैं. इसके बाद घुप्प अँधेरा.. सोच को लकवा मार जाता है, विवेक हांफता, गिरता-सा लगता है, करुणा से नाता टूट जाता है. हम ज़िन्दा तो होते हैं लेकिन जीवन-विहीन. स्पंदन तो चल रहा होता हैं लेकिन सांस को आस नहीं होती. आँखें बंद तो रहती हैं लेकिन सपने कहीं बहुत पीछे छूट गए होते हैं. नींद में होते हैं या बेसुध, यह पता ही नहीं चलता. असंवेदनशील हो जाते हैं. कब तक मांगेंगे और कितना मांगेंगे? वो तो देते-देते नहीं थकता, हम ही लेते-लेते थक जाते हैं. शायद अब मांगने में थोड़ी झिझक, शर्म महसूस भी होने लगती है.

तब उस फ़क़ीर का असली खेल शुरू हो जाता है. हमें उससे जो कुछ भी मिला है उसके खो जाने का डर, उसके नष्ट हो जाने की अनुभूति फिर हमें उस साई के पास ले आती है. उसे वापस हमारे विश्वास में ढूँढने लगते हैं.


वो तो वहीँ मिलता है जहाँ से हम अपना हाथ छुड़ा कर उससे दूर चले गए थे. हमारी पत्थर हो चुकी आँखों से पश्चाताप के आंसू झरने लगते हैं. पहले हमें भिगोते हैं और फिर हमारे मृत हो चुके अंतर्मन को. संवेदना फिर जागने लगती है, करुणा के पुष्प विवेक की सुगंध से भर उठते हैं. जान जाते हैं कि वो तो हमारा है ही, हम ही उसके न हो पाए. अब हम उसके हो जाना चाहते हैं. वो तो बाहें खोले खड़ा है. समाने में तो हमने देर कर दी. उसमें समाने भर की देर है, दुःख कब सुख बन जाता है पता ही नहीं चलता. चिंता शांति में तब्दील हो जाती है. भय आनंद बन जाता है. पहले दूसरों के सुख से दुखी और उनके दुःख से सुखी होने वाले हम अब दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढने लगते हैं और उनके दुखों में उनको उबारने की कोशिश करते हैं.

हम साई को फिर पा चुके होते हैं.       

बाबा भली कर रहे..