Friday, 2 January 2015

मोह-माया के जाल से निकालते हैं साई..


जो कुछ मेरे पास है, सबकुछ तेरा साई ।
छत्रछाया तुम्हारी मिले और कुछ न माँगूं साई ।।

बाबा सदा फक्कड़ बनकर रहे फिर भी उनके पास कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। न खाने-पीने न पैसे और न कपड़े-लत्ते की। लेकिन हम सारी उम्र पैसा-पैसा करते रहते हैं। पैसा इंसान की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन भाग्य विधाता नहीं। क्योंकि अगर पैसा हाथ की रेखाएं बदल सकता तो सबसे पहले आदमी मृत्यु को जीतता खुशियां बाजार में बिकतीं और पुण्य की बिक्री सबसे ज्यादा होती। क्योंकि नरक कोई जाना नहीं चाहता न जीते जी भोगना चाहता है और न मरने के बाद वहां के दर्शन करना चाहता है। कितना दिलचस्प और हैरानी भरा प्रसंग है कि किसी ने मृत्यु के बाद क्या होता है, वो कहां जाता है और क्या करता है, कुछ भी नहीं देखा फिर भी भय है कि, पीछा नहीं छोड़ता।

लेकिन मृत्यु के बाद स्वयं को कष्टरहित रखने के लिए इस जीवन में लाख जतन क्या उचित है? बाबा का हमेशा यही संदेश रहा है कि जो कुछ करना है, इसी जीवन में करो। अगर आपके पास पर्याप्त धन है, तो उसका सदुपयोग करो, लोगों के अन्न-जल-कपड़े का प्रबंध करो, अगर कोई शारीरिक या मानसिक परेशानी में है, तो उसकी आगे बढ़कर सहायता करो। अगर सच्चे मन से यह मानवीय कत्र्तव्य निभाते हो, अच्छे मन से परोपकार करते हो, तो नरक क्या मृत्यु का भय भी अंदर से जाता रहेगा।

इंसान से गलतियां होना स्वाभाविक-सी बात है, लेकिन जो इनसे सबक लेता है, वो साई का सच्चा भक्त है। बाबा हमें हमारी गलतियों का अहसास कराकर सही राह पर लाते हैं। बाबा दान-दक्षिणा में लोगों से अन्न-तेल या पैसा तक ले लेते थे, लेकिन इन सब चीजों को लेने का उनका उद्देश्य कुछ अलग होता है। वे सभी सामग्रियों का इस्तेमाल लोगों की भलाई में कर देते थे। जैसे एक बार उन्होंने ढेर-सारा गेहूं पीसकर आटा शिर्डी की सरहद पर फिंकवा दिया। लोगों ने सोचा, अरे यह क्या करते हैं बाबा? इतने सारे आटे का नुकसान करा दिया? लेकिन उसी फेंके गए आटे के असर से जब प्लेग जैसी बीमारी शिर्डी में प्रवेश नहीं कर पाई, तब लोगों को बाबा की महिमा समझ आई। इसलिए हमें अपने माता-पिता, गुरु आदि को समय-समय पर उनके परोपकार या सहयोग के लिए कुछ न कुछ देते रहने चाहिए। ऐसा क्यों यह भी जान लीजिए!

जब से मनुष्य का जन्म हुआ, यह बात तब से प्रासंगिक है। हम ईश्वर, महापुरुषों और माता-पिता का कर्ज कभी नहीं चुका सकते। हां, हम उसके बदले में कुछ दे अवश्य सकते हैं, लेकिन यह न तो मूल होगा और न सूद। बल्कि कुछ नई चीज होगी। कहने का तात्पर्य हम अपने माता-पिता, गुरु आदि से बहुत कुछ सीखते हैं। उनकी सीखों, बातों पर अमल भी करते हैं, जो हमारी जिंदगी में बदलाव लाती हैं। इन्हीं परिवर्तनों से उपजी सकारात्मक चीजें हम दूसरों को बांट सकते हैं। इसे परोपकार भी कहते हैं, समाजसेवा भी और अपनों, देश-दुनिया-समाज को कुछ देने का सार्थक प्रयास भी।

साई हमारे मार्गदर्शक हैं। उनका सान्निध्य, स्मरण हमें निरंतर कुछ न कुछ बेहतर चीजें प्रदान करता है। नई ऊर्जा देता है, ठीक से जीना सिखाता है। सही कर्मों की ओर अग्रसर करता है। साई हमें बहुत कुछ देते हैं। वे कण-कण, हर मन में अच्छे भावों और विचारों के साथ विद्यमान हैं। इसलिए जब भी हम साई को कुछ लौटाएंगे, वो एक साथ तमाम लोगों तक पहुंच जाएगा।

इसे इस प्रकार समझ सकते हैं। ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। बस उसका स्वरूप बदल जाता है। हम भोजन-पानी के रूप में ऊर्जा प्राप्त करते हैं। उसी ऊर्जा से हम श्रम करते हैं। खेतों में फसल उगाते हैं। यानी भोजन से हमें मिली ऊर्जा हमें श्रम देती है और उसी श्रम से हम फिर से ऊर्जारूपी फसलें उगा देते हैं। साई का सान्निध्य, उनकी सीख भी ऊर्जा का रूप ही है। उनके स्मरण से हमारे तन-मन को एक नई चेतना मिलती है, स्फूर्ति मिलती है, और हम इन सबसे अपना, अपने परिवार का, समाज का और देश का भला करते हैं।

इसलिए कोई भी कर्म करें, चाहे वो साई की भक्ति ही क्यों न, यह भाव अपने अंदर रखें कि, तेरा तुझको अर्पण। यह भाव इसलिए जरूरी है, क्योंकि हम ऊर्जा का संचार नहीं रोक सकते, लेकिन उसे सही या गलत दिशा में अवश्य मोड़ सकते हैं। यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि, हमें अपने अंदर की ऊर्जा का कैसे इस्तेमाल करना है। मुंह से निकली एक फूंक आग बुझाती भी है और भड़काने का काम भी करती है। उसका सही इस्तेमाल एक कला है। आग बुझाने में झटके से फूंक मारनी पड़ती है, जबकि भड़काने या सुलगाने के लिए धीरे-धीरे। कब, कितने प्रेशर से हवा मुंह से छोड़नी है, यह एक कला है। यह कला हमें साई सिखाते हैं। वे अपनी बातों और सबकों से हमें ऊर्जा देते हैं। साथ ही यह भी बताते हैं कि उस ऊर्जा का कहां और कैसे सकारात्मक इस्तेमाल करना है। इसलिए हमें यह भाव अपने मन में रखना चाहिए, तेरा तुझको अर्पण। यह भाव निश्चल है। सकारात्मक है। समग्र दुनिया के हित में है।

साई जो तुझसे प्राप्त किया है, वो हम तुझको ही दे रहे हैं। साई जो तूने हमें दिया है आशा है कि जब हम तेरे चरणों में अर्पित करेंगे, तो उसी भाव से अर्पित करेंगे, जिससे तूने हमें नवाजा हैं।

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो है सो तेरा होई।
साई तुझसे विनती, जो रखो तो दोनों ।।

साई तुम हमारे इष्ट हो। तुम्हारे बिना हमारी कल्पना नहीं। यद्यपि तुम हर कण में समाए हुए, हो फिर भी तुम आओ और यहां बैठो। हमारे मन में। हमारे मस्तिष्क में। हम साथ बैठकर बातें करेंगे।
 साई नाम सुमिरन से जग जागा.... जग जागा, जग जागा।
साई अब तुम भी, आंखें खोलो
जागो साई देव हमारे

तब की एक कहानी....
बाबा के एक परमभक्त थे भागोजी शिंदे। जैसा कि आपको विदित है, लुहारिन के बच्चे को बचाने के लिए बाबा ने धूनी में हाथ डाल दिया था। भागोजी बाबा की इस घटना में जले हुए हाथ की मलहम-पट्टी करता था। माधवराव देशपांडे ने इसकी सूचना नाना साहेब चांदोरकर को कर दी थी। वे मुंबई (उस वक्त की बम्बई) के ख्यात चिकित्सक परमानंदजी के साथ दवाइयां लेकर शिर्डी पहुंचे, लेकिन बाबा ने उनसे इलाज कराने से मना कर दिया। बाबा सिर्फ भागोजी से ही मलहम-पट्टी कराते थे। भागोजी को कुष्ठ रोग था। उनकी उंगलियां सड़ चुकी थीं, बदबू मारती थीं। स्वाभाविक है कि जो इनसान अपने धन-बल के जरिये परोपकार खरीदने की चेष्टा करता हो, वो असल में भागोजी के पास क्यों आएगा, बैठेगा? लेकिन बाबा भागोजी से ही सेवा कराते थे। जब बाबा लेंडीबाग जाते, तो भागोजी छाता लेकर उनके संग-संग चलता था।
दरअसल, यह कोई सामान्य बात नहीं थी, बल्कि इसमें एक गूढ़ रहस्य छिपा था। जिसने भी यह रहस्य जान लिया, वो मोह-माया के चंगुल से मुक्त हो गया।


बाबा ने कुष्ठ रोगी भागोजी को अपना सामीप्य देकर एक संदेश दिया कि अगर आप मोह-माया के साथ परोपकार करने चले हैं, लोगों की मदद करने चले हैं, तो सारा कर्म व्यर्थ है। ऐसे कर्म आपको स्वर्ग ले जाएंगे, कह पाना मुश्किल है। क्योंकि इसमें आपका निःस्वार्थ भाव नहीं दिखाई देता, आप सच्चे मन से मनुष्य की सेवा नहीं कर रहे, बल्कि अपने धन-बल से पुण्य खरीदने की चेष्टा कर रहे हैं। इसलिए जब तक मोह-माया के जाल से निकलकर मनुष्य की सेवा नहीं करेंगे, तब तक पाप-पुण्य का भेद दूर नहीं कर पाएंगे।


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