Wednesday, 7 October 2015

दिखावा क्यों करना?




श्री साई सच्चरित्र में एक जगह उल्लेख आता है कि बाबा के कीर्तनकार गणपतराव दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे जो बाद में दासगणु महाराज के नाम से जाने गए, एक दफे बाबा के कीर्तन करने निकलने ही वाले थे जब बाबा की नज़र उन पर पड़ी. ज़रीदार कुरता, अचकन, सर पर पगड़ी और रेशमी धोती पहने दासगणु महाराज को बाबा ने मुस्कुराकर पूछा कि वे दूल्हे की तरह सज कर कहाँ जा रहे हैं. उनका अभिप्राय जानकार बाबा ने उनसे कहा कि एक कीर्तनकार को ऐसे सज-धज कर कीर्तन करना शोभा नहीं देता और उन्हें अपने आचरण में सादापन लाना चाहिए. दासगणु महाराज ने तुरंत बाबा की आज्ञा का पालन किया और बिना देर अपना हुलिया बदल लिया. उसके बाद हाथ में करताल, गले में माला और सादी सूती धोती पहने दासगणु महाराज जब भी कहीं कीर्तन करने जाते तो भक्तों के बीच में एक कुर्सी पर बाबा की एक फोटो लगा लेते. उनका यश बढ़ने लगा, मान होने लगा. उनके गाये भजनों से भक्तों के बीच बाबा के दर्शनों को लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी. कहा जाए तो साई बाबा की ख्याति को बढ़ाने में जितना नानासाहेब चांदोरकर का हाथ था उतना ही दासगणु महाराज के भजनों का भी. बाबा की ली हुई चुटकी के बाद दासगणु महाराज दिखावे के दलदल से निकल आये और दूसरों को अच्छा दिखाने की ललक से ऊपर उठ एक नया और ऊंचा स्थान सादगी के माध्यम से पा लिया जो शायद दिखावे की ज़िन्दगी में उन्हें नहीं मिल पाता.

हमारे वर्तमान समाज में बाबा की यही सीख आज भी प्रासंगिक है. हम लोग सादगी का आचरण छोड़ कर दिखावे की बनावटी ज़िन्दगी जीने लग पड़े हैं. कपड़े-लत्ते, खान-पान, रहन-सहन..सभी में हमें दिखावा करना अधिक भाता है. हर पल, हर घडी, हर लम्हा हम सभी एक बनावटी जीवन जीते हैं. दूसरों से अधिक और दूसरों से जल्दी पाना चाहते हैं. दिखावा चाहते हैं. दूसरे से अपने आप को बेहतर और अधिक संपन्न दिखाना चाहते हैं.

इसी फेर में संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं और हम सब आत्म-केन्द्रित होने लगे हैं. यह एक अंधी होड़ है जिसमें जल्द ही हमारी सांस घुटने लगती है. इस होड़ में हम इतना अधिक और जल्दी टूटने लगे हैं कि अन्दर के उठते शोर को कम करने के लिए जम कर ज़ोर-ज़ोर से बजते म्यूज़िक पर छद्म आभास देनी वाली रंग-बिरंगी रौशनी के बीच वाईन के गिलास हलक से नीचे उतारते हुए सब कुछ भूल जाना चाहते हैं. इस छलावे की भूल-भुलैया में नशे में धुत्त, डूबते-उतरते ये भूल जाते हैं कि इन सब के ख़त्म हो जाने पर उसी दुनिया से वाबस्ता होना है जो सुरसा की तरह मुंह खोले वहीँ खड़ी है जहां से हमने उससे दूर जाना चाहा था. ये ऐसी दौड़ है जिसमें हारना तय है. अपने आप से भी और दुनिया से भी. दिखावे की दुनिया में रहते-रहते हम अपनी पहचान भूल जाते हैं.

कई बार वक़्त आईना दिखाता भी है तो हम डर कर उससे दूर भागने लगते हैं कि अपना चेहरा हम उसमें कैसे देखें! मन की शांति भंग हो जाती है. मान-मर्यादा छितर सी जाती है. परिवार बिखरने लगता है. अपने पराये लगने लगते हैं और परायों में अपनापन ढूंढते हैं. इस होड़ में सब पिछड़ने लगता है. जिसे पाने के लिए ये सब किया वो अर्थहीन सा लगता है. जिस सुख को पाने के लिए ये जद्दोजहद की थी वो तो सुख था ही नहीं. मन उदास, शरीर बेदम, सांस उखड़ी सी, आँखें सूनी. क्या यही पाने की दौड़ थी? उदास मन को राह मिलती नहीं.

बाबा की सीख अँधेरे में उजाले की आस जगाती है. भजन में जाना है तो ये दिखावा किस के लिए? दुनिया के आगे खुद को दूसरों से बेहतर बनाने के इस भंवर में डोलते हम भूल चुके होते हैं कि जीवन तो अपने आप में ही एक भजन है जिसमें सुख का सुर, शांति की लय और आनंद की ताल मिलने से ही जीवन संपन्न होता है. कुछ भी ऊपर नीचे हुआ तो ये भजन बेसुरा, बिना लय और बेताला हो जाता है. सब कुछ गड़बड़. औरों की देखा-देखी कर उनसे ताल मिलाने के फेर में हमारा सुरीला भजन कब बेसुरा हो जाता है, पता ही नहीं चलता. सुरों में सादगी, लय का सुखद प्रवाह, ताल की एकरूपता और प्रेम का भाव इस भजन को सम्पूर्ण आनंदमयी अनुभूति बना देते हैं.

जीना है तो दूसरों के लिए लेकिन दूसरों को दिखाने और उनसे होड़ के लिए नहीं. साई के जीवन-पुष्प से ये एक पंखुड़ी हमारे जीवन को महकाने के लिए काफ़ी है.


बाबा भली कर रहे..

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभम भवतु.

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