Wednesday, 6 July 2016

साई के साथ स्वभाव से स्वरुप की ओर



साई बाबा को उनके भक्त अलग-अलग स्वरूपों में पूजते हैं. कोई उन्हें निर्गुण, निराकर ईश्वर मानता तो कोई सगुण साकार भगवान्. कोई उन्हें संत के रूप में पूजता है तो कोई साधु मानता है तो कोई चमत्कारी अवतार. यह सभी धारणाएं आपस में कहीं नहीं मिलती. बिलकुल विरोधाभासी हैं. साई को तो जिसने जिस रूप में ध्याया, उसी रूप में पाया. ‘जया मनी जैसा भाव, तया तैसा अनुभव..’ यानि जैसा भाव रहा जिस जन का, वैसा रूप हुआ मेरे मन का. रामचरित मानस में तुलसीदासजी ने कहा भी तो है, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.” भाव में ही भगवान् बसते हैं.

साई के तमाम मानने वाले इस बात पर तो एकमत हो जाते हैं कि साई सद्गुरू हैं. गुरु या मुर्शिद का शीर्ष या सर्वोत्तम प्रकार. लेकिन साई तो एकदम अनोखे सद्गुरू हैं. न तो साई ने कभी किसी को अपना चेला ही बनाया, न ही कोई मठ ही स्थापित किया, किसी के कान में कोई गुरुमंत्र भी नहीं फूंका. न उन्होंने कभी किसी गुरु की तरह चोला पहना और न ही कभी अपनी किसी गुरु की तरह पूजा करने को किसी को बाध्य ही किया. अपने भक्तों द्वारा दी गयी चांदी की पालकी में कभी साई स्वयं बैठे भी नहीं. साई ने तो कभी माला भी नहीं फेरी. कोई कुल नहीं बनाया.
गुरुओं की स्थापित मान्यता के विरुद्ध साई तो हमेशा फटे कपड़ों में ही फिरते, पांच घरों से मिलती भिक्षा पर गुज़ारा करते. एक टूटी-फूटी ईमारत में रहते. कीचड़ से भरे फ़र्श पर सो जाते. दान में मिले तेल से अपने ठिकाने, अपनी मस्जिद को रोशन रखते. उनके अधरों पर सदा ही ‘अल्लाह मालिक’ रहता. सादगी इतनी कि वे तो सदा अपने आप को ईश्वर का दास मानते. अपना गुणगान करने वाले दासगणु महाराज का वे स्वयं को ऋणी मानते और मस्ती में ख़ुद को दासानुदास कहते. दास का भी दास! साई की शिक्षा पद्धति एकदम अलग रही. इस धरती पर अपने शारीरिक अवतार के अंतिम पड़ाव में उन्होंने अपने भक्तों को दान की महत्ता समझाने के लिए उनसे दक्षिणा लेना शुरू कर दिया था. उन्होंने कभी भी शास्त्रों, वेदों, पुराणों या क़ुरान के श्लोक या आयतें कभी किसी को नहीं समझाई और न ही कभी कोई बड़ी मुश्किल भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने तो सदा ही इन महान धार्मिक पुस्तकों का निचोड़ अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों के माध्यम से समझाया. साई की शिक्षा पद्धति में इन पुस्तकों के शब्दों का अर्थ नहीं बल्कि शब्दों के पीछे के भावों का अर्थ ज़रूरी रहा जिसे उन्होंने बहुत ही सरल तरीके से अपने भक्तों को समझाया.

ऐसे ही एक अवसर पर जब मस्जिद में नानासाहेब चांदोरकर ने श्रीमद् भगवद्गीता का एक श्लोक, “त्वद्दिधि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया, उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानित्त्त्व दर्शिनः” बोला तब बाबा ने उनको यह श्लोक पुनः दोहराने को कहा. अपनी सीमित बुद्धि के चलते नानासाहेब ने दंभ भरे अंदाज़ में यह श्लोक यह समझ कर पुनः बोल दिया कि साई बाबा का संस्कृत से क्या वास्ता! लेकिन जब बाबा ने शब्दों के परे जाकर श्लोक के एक-एक शब्द के पीछे के भाव को नानासाहेब को समझाया तब नानासाहेब के आश्चर्य का कोई अंत न रहा. मंत्रमुग्ध वे बाबा के ज्ञान की थाह पाने की कोशिश ही करते रहे. बाबा ने इस श्लोक की व्याख्या कर नानासाहेब को समझाया कि अपने अहंकार को छोड़, पहुंचे हुए सिद्धपुरुषों के शरणागत हो जाने से मनुष्य के ज्ञान पर पड़ा आवरण हट जाता है और ज्ञान पुनः चमकने लगता है. मतलब यह हुआ कि साई के अनुसार गुरु किसी को भी ज्ञान नहीं देते हैं सिर्फ़ किसी में जो ज्ञान पहले से ही है उसका अहसास कराते हैं. हमारे ज्ञान के ऊपर जो परत चढ़ जाती है, गुरु सिर्फ़ उन परतों को साफ़ करते हैं. मानो कोई हमारी आँखों में पड़े कचरे को कोई साफ़ कर दे जिससे हमें फिर से साफ़-साफ़ दिखाई देने लगे.
यही गुरु शब्द का अर्थ भी है. ‘गुरु’ को दो शब्दों में बांटने पर हमें ‘गु’ और ‘रु’ मिलते हैं. गुरु गीता के अनुसार ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ होता है हटाने की क्रिया. तब गुरु शब्द का अर्थ हुआ अंधकार हटाने की क्रिया. इसी तरह दीक्षा को जब दो भागों में तोड़ कर देखते हैं तो ‘दी’ का अर्थ दाग़ और ‘क्षा’ का अर्थ साफ़ करने की प्रक्रिया. गुरु द्वारा किसी को दीक्षित करने का अर्थ होता है दाग़ साफ़ करने की प्रक्रिया. यही कार्य साई बाबा ने तमाम उम्र किया. उन्होंने अपने जीवन जीने के तरीके से अपने भक्तों के जीवन से दाग़ हटाने का ही कार्य किया. आज भी कर रहे हैं.

हम सभी इस धरती पर परमपिता परमात्मा से एक निर्मल स्वरुप लेकर आते हैं. जब हम छोटे से बच्चे होते हैं तो हमें चोरी-छल-कपट, धोखा, लोभ-लालच, शोक, अभिमान के बारे में कुछ भी मालूम नहीं होता. जीवन का आनंद लेते हुए अपने में मस्त भी रहते हैं और दूसरों को आनंद भी देते हैं. आराम से नींद भी आ जाती है. सोते हुए जब मुस्कुराते हैं तो लगता है कि भगवान् से बातें कर रहे हैं. हम सभी के प्यारे होते हैं, दुलारे होते हैं, आँखों के तारे होते हैं. यह हमारा मूल स्वरुप होता है.
अब शुरू होती है स्वरुप से स्वभाव की यात्रा. स्वरुप से स्वभाव की यह यात्रा सुख से दुःख की यात्रा बन जाती है. सुख, शांति और आनंद शोक, मोह और भय में बदल जाते हैं. बड़े होने लगते हैं तो हमारा स्वरुप हमसे दूर होता जाता है. लोभ और मोह की वासना में बहुत कुछ पा लेने की इच्छा मन में लिए हुए हम धोखा देने लगते हैं. झूठ भी बोलते हैं. अपनों का अपमान कर उनसे दूर भी हो जाते हैं. मुस्कुराना भूल जाते हैं. छोटी-छोटी बातों पर झल्लाना, चिल्लाना शुरू कर देते हैं. दूसरों को आनंद देना तो दूर, उनके भी दुःख का कारण बन जाते हैं. हमें अब नींद नहीं आती. एकांत ढूंढते हुए कब अकेले पड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता. अकेले पड़ते ही आँखों से आंसूं बहने लगते हैं. कोई सहारा ढूंढते हैं. तब साई सहारा बन कर आते हैं.


सद्गुरू बन कर साई पहले तो चमत्कार कर हमें अपनी तरफ़ खेंचते हैं. फिर धीरे-धीरे हमारे मन में बस कर वहाँ की गंदगी साफ़ करने लगते हैं. उनका जीवन चरित्र और उसकी विशेषताएं हमारे अँधेरे जीवन में आशा की किरण दिखा देती है. अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, मन के एक कोने से आवाज़ आती है. हमारे मन की गहराइयों में साई हमें अपना मूल स्वरुप दिखा कर फिर से याद दिलाते हैं कि कभी हम कैसे थे और अब कैसे हो गए हैं. उस स्वरुप को देख, मन में फिर से स्वभाव से स्वरुप की यात्रा करने की इच्छा प्रबल हो उठती है. मन का सारा मैल, पश्चाताप के आंसुओं में धुलकर बाहर निकलने लगता है. अब काम की इच्छा तो रहती है लेकिन शत्रोक्त. क्रोध भी आता है लेकिन अपनी कमियों पर. मोह बढ़ता जाता है लेकिन सद्गुरू के चरणों का. लोभ भी रहता है लेकिन साई की संगत का. इर्ष्या भी होती है लेकिन सकारात्मक. अभिमान स्वाभिमान में बदल जाता है. साई सारे ही अवगुणों का पट बदल देते हैं.
बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के साई हमारे सारे अवगुणों का रूप बदल देते हैं, हमें बदल देते हैं. अपने इस बदले स्वरुप में हम ख़ुद को फिर से प्यारे लगने लगते हैं, दूसरों से सम्मान पाने लगते हैं. साई की गुरुता का अहसास हमें होने लगता है. मन ही मन हम साई की गुरुता को अपने शिष्यत्व के माथे पर रख देते हैं. सच ही तो है, हममें शिष्य बनने की इच्छा हो तो भगवान् स्वयं सद्गुरू का रूप लेकर आ जाते हैं. साई हमारे अन्दर सुधार की इच्छा को प्रबल कर शिष्यत्व का भाव पैदा करते हैं. ऐसे सद्गुरू साई के चरण अपने आंसुओं से धोने का दिल कर उठता है.    
                  
बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु

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