Friday, 24 March 2017

गुरूर से पैदा सारे मैल दूर करता है गुरु


[Copyright Notice: No portion of this blog may be used or reproduced in any manner without the written and explicit permission of the owner of this Blog.] 
जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। हम जो काम कर रहे हैं या जिस दिशा में जा रहे हैंवो ठीक है या नहींइसका मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है। जो भी इसमें हमारी सहायता करता हैउसे हम अपना गुरु मान लेते हैं।

गुरु कोई भी हो सकता है। कोई व्यक्ति भी और अजीवित-जीवित चीज भी। यह जरूरी नहीं कि हम गुरु की तलाश में यहां-वहां भटकें। या यह मानकर चलें कि कोई व्यक्ति विशेष ही हमारा गुरु बनने के काबिल है। यह भी आवश्यक नहीं कि गुरु वही हो सकता हैजो शिक्षित हो या धन-बल से परिपूर्ण हो। कम पढ़ा-लिखा या अनपढ़ व्यक्ति किसी को सही राह दिखा सकता है।

उदाहरण के तौर पर जंगलों में रहने वाले आदिवासी कम पढ़े लिखे या अनपढ़ भी हो सकते हैंलेकिन उन्हें जंगल के चप्पे-चप्पे का पता होता है। जब कोई घने-डरावने जंगल में भटक जाता हैतो वे उसे सही राह दिखा देते हैं। उस संकट के समय वे ही हमारे मार्गदर्शन-गुरु होते हैं। ऐसे ही एक आदिवासी गुर का ज़िक्र श्री साई सच्चरित्र में आता है।

अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि भला अजीवित चीजें भी किसी का मार्गदर्शन कर सकती हैंआपने मील का पत्थर देखा होगा। वह अजीवित पत्थर अनजान रास्तों पर हमारा मार्गदर्शन करता है। साइन बोर्ड अजीवित वस्तु हैंवे हमें सही राह दिखाते हैं। जीवित चीजें जैसे पेड़-पौधे हमें शुद्ध वातावरण देकर हमारे जीवन को खुशहाल बनाते हैं। एक प्रकार से ये भी गुरु तुल्य हैं।

यह तो सभी भली-भांति जानते हैं कि कण-कण में ईश्वर का वास होता है। इससे ही स्पष्ट हो जाता है किजो भी कणचाहे वो जीवित हो या अजीवित हमारा मार्ग प्रशस्त करता हैवो हमारा गुरु है। यानी सीधे तौर पर वो हमारा ईश्वर है। हम भी कण-कण से निर्मित हैं। इसलिए हम खुद भी अपने गुरु हो सकते हैं। अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुनकर सही दिशा की ओर बढ़ सकते हैं।



गुरु की महिमाउसके मायने आदि को लेकर अनगिनत किताबें रची गई हैं। अब हम शास्त्रों में वर्णित गुरु गीता’ में की गई व्याख्या से गुरु’ शब्द को समझने की कोशिश करते हैं। अगर हम ‘गुरु शब्द को विभक्त कर दें, तो गु’ और रु’ अक्षर हमें मिलते हैं। गु’ का अर्थ होता है अन्धकार’ और रु’ का अर्थ दूर करना। इस प्रकार से गुरु’ का अर्थ हुआअंधकार को दूर करने वाला हालांकि वर्तमान समय में गुर द्वारा दीक्षित किए जाने के मायने ही बदल गए हैं। यदि गुरु द्वारा दी जाने वाली दीक्षा का शाब्दिक अर्थ समझेंतो गुरु के मायने और भी स्पष्ट हो जाते हैं। दी’ का अर्थ है दाग (मैल) और क्षा’’ प्रयुक्त होता हैक्षय करने की क्रिया के लिए। इस प्रकार दीक्षा’ का अर्थ होता हैदागों का क्षय करना सरल भाषा में गुरु द्वारा दीक्षित किए जाने अर्थ होता हैगुरु द्वारा हमारे (मन का) मैल दूर करने की क्रिया इसी तरह से गुरु के प्रकारों में समर्थ सद्गुरु को गुरुता का सर्वोच्च स्तर माना गया है। साई समर्थ सद्गुरु हैं।

गुरूर और गुरु इन दोनों शब्दों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। लेकिन इनके मायने और मर्म में जमीन-आसमान का अंतर है। जो स्वयं को गुरु से भी महान समझने लगे, वहां से गुरूर का जन्म होता है। गुरूर का वास हमारे दिमाग को उद्देलित करता है। उसे भटका देता है। मस्तिष्क से उपजा गुरूर धीरे-धीरे मन का मलिन कर देता है। इस प्रकार हम अपने ही गुरूर में डूबे हुए अपना जीवन खराब कर लेते हैं। दूसरों के जीवन को खराब करने का प्रयास करते रहते हैं। वहीं गुरु का वास दिल में होता है। अगर दिल सही ढंग से धड़केगातो निश्चय ही दिमाग भी ठंडा रहेगा। सही से सोचेगा। यानी गुरु दिमाग में बैठे गुरूर को दूर कर देता है। हमें क्या चाहिए गुरूर या गुरु? यह हम पर निर्भर करता है। हांगुरूर बहुत सस्ते और आसानी से मिल जाता हैलेकिन गुरु को पाना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं। कहते भी हैं कि कुछ बेहतर पाने के लिए परिश्रम तो करना ही होता है। परिश्रम भी सही दिशा में होना आवश्यक है। दिशाहीन परिश्रम व्यर्थ है। गुरु दिशासूचक है।

वैसे यह कहना बहुत आसान होता है कि मनुष्य यदि कामक्रोधलोभ और मोह के पाश से मुक्त हो जाए, तो वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो जाता है। लेकिन दैनिक कार्यों में लग कर,गृहस्थाश्रम में रह कर यह उतना आसान भी नहीं होता। हम सबमें से कितनों ने आसानी से मन के इन विकारों से छुटकारा पाया होगाइस पर गौर करें। काम-क्रोध-लोभ और मोह को बलात् छोड़ने की कोशिश भी परेशान कर देने वाली होती है। जब तमाम कोशिशों के बावजूद इन विकारों से हम छूट नहीं पातेतो मन में हताशा का भाव पैदा होने लगता है। अपनी कमतरी का अहसास होने लगता है। अपने कर्म में अभाव महसूस होने लगता है। लगने लगता है कि जितना कर्म हम कर रहे हैंउसका उतना फल मिलेगा भी की नहीं?


     

बाबा हमेशा उन लोगों के बीच रहेजिनमें काम-क्रोध-मोह और लोभ गहरी पैठ जमाए होते थे। दरअसलकिसी गुरुसाधु-संत या ईश्वर के पास वे ही लोग सबसे पहले पहुंचते हैंजिनका गुरूर सिर चढ़कर बोलता है। वे अपने गुरूर में यह परखते हैं कि फलां गुरुसंत या ईश्वर उनके विकार दूर कर भी पाएगा कि नहींलेकिन ऐसे अज्ञानियों का क्या पता होता किअगर वे किसी गुरु के सान्निध्य में पहुंचे हैंतो कहीं न कहीं उनका गुरूर टूटा अवश्य है।


साई बाबा को समर्थ सद्गुरु माना गया है। वे सही मायनों में समर्थ सद्गुरु हैं भी। साई के संपर्क में जो भी आयासाई ने उसके दुर्गुणों का नाश न करते हुए उनके स्वरूप को ही बदल डाला। साई का संसर्ग होने पर रोम-रोम हर्षित हो उठता है। मन में प्रसन्नता का भाव जाग्रत हो उठता है। शरीर में एक विद्युत-सा प्रवाह अनुभव करते हैं। साई के चरणों से प्रीति का अनुभव होता है और अपने सारे दुर्गुणों का सहज ही आभास होने लगता है। दुर्गुणों का आभास होने पर उनका दमन करने की इच्छा जाग उठती है। बदलाव की इच्छा जाग्रत होने लगती है और बदलने की इच्छा का उदय ही बदलाव की ओर पहला कदम होता है।

साई की भक्ति इतने मानुषिक भाव जगा देती है कि जन्म-जन्मों के कर्मों के प्रभाव से निर्मित हमारा स्वभाव और उनके विकार शने:-शने: क्षीण होने लगते हैं। साई में प्रीति हमारे दुर्गुणों का इलाज करते हुए उन्हें सद्गुणों में बदल डालती है। हमारी आंखों के रास्ते हमारे सारे दुर्गुण पानी बनकर बह जाते हैं। हम सहज भाव से अपने दुश्मन को भी माफ कर देते हैं। लालच से पार पाते हैं। अहंकार से ऊपर उठ पाते हैं। यकायक हमें यह लगने लगता हैं कि साई ने हमें नवाज़ दिया हैउसने हमें वो सब तो दिया ही जो हम मांगने आए थे, पर उसने उससे कहीं अधिक भी दे दिया है। वो सब भी जो हमने तो मांगा ही नहीं था। बाबा ने ऐसे ही असंख्य भक्तों को अपने आशीष से पार लगा दिया और लगा रहे हैं। बाबा सबके अंदर परोपकार की भावना प्रबल कर देते हैं। वे ऐसा लगातार कर रहे हैं और करते ही रहते हैं।

शिर्डी में उनका पहला और ज्ञात चमत्कार उनकी इसी विधा को सुस्पष्ट करता है, जब उन्हें शिर्डी के बनियों ने मस्जिद में दीप जलाने के लिए तेल देने से मना कर दिया गया था। तब उन्होंने मस्जिद के जल को तेल में परिवर्तित करके दीप जलाये थे। यह चमत्कार देखकर बनियों के दिल में डर बैठ गया कि अब तो वे इस फकीर के श्राप से नहीं बच सकते। परन्तु बाबा ने उनको न सिर्फ माफ कर दिया, बल्कि उन्हें यह ज्ञान भी दिया कि झूठ बोलकर तेल नहीं देने से उन्होनें किस प्रकार ईश्वर से झूठ बोला है। वरन मानवता की दृष्टि से भी वे किस प्रकार से दोषी हैं। यह सुनकर बनिए बाबा के चरण में गिर पड़े। उनमें आतंरिक सुधार होता गया।


हेमाडपंत की ‘श्री साई सतचरित्र’ में ऐसे कई प्रसंग पढ़ने को मिल सकते हैं। बाबा के चमत्कार से जुड़ी एक ऐसी ही अन्य घटना के बारे में और जानिए। एक बार बाबा के दर्शन को मुस्लिम महिला पहुंची। उस वक्त वहां नानासाहेब चांदोरकर भी मौजूद थे।  नाना उस महिला के सौंदर्य रूप पर मोहित हो उठे। हालांकि जैसे ही उनके मन में उस महिला के प्रति वासना के भाव जागृत हुएतो उन्हें आत्मग्लानि महसूस होने लगी।  बाबा ने नाना के मन को पढ़ लिया। बाबा ने नाना के घुटने पर एक थपकी लगाते हुए कहा कि ईश्वर की बनाई हर वस्तु सुंदर है। सुंदरता के दर्शन करना कतई बुरा नहीं है। जिस ईश्वर की निर्मित सृष्टि इतनी सुन्दर हैवह स्वयं कितना सुन्दर होगा! इस भाव से सृष्टि को देखेंगे, तो उस परम-पिता की सुंदरता हमारे मन में बस जाएगी। सुंदरता से प्रभावित होना बुरा नहीं हैबुरा है उससे अहितकारी विचारों का पनपना। बाबा के कहने का आशय समझते ही नाना को सहज ही अपनी गलती का अहसास हो गया और उसके मन से मैल साफ़ हो गया।

‘’श्री साई सतचरित्र’ में कई स्थान पर बाबा के क्रोधित हो जाने का उल्लेख भी आता है। संतों का क्रोधित होना कोई असामान्य बात नहीं है। हमारे शास्त्रों में लिखा गया है कि जो भी संतों के क्रोध का पात्र बन गयाउसका जीवन तर गया। बाबा का क्रोध जिद:क्रोध कि श्रेणी में आता है। ऐसा क्रोधजिसका कारण सामान्यजन की समझ में नहीं आता। इस प्रकार का क्रोधलोगों में सुधार लाने के लिए होता है न कि मन कि हताशा या अप्रसन्नता प्रकट करने के लिए। जितनी जल्दी बाबा को क्रोध आता थावह उतनी ही जल्दी सामान्य भी हो जाते थे। आमतौर पर बाबा के अनन्य भक्त इस प्रकार के क्रोध को सामान्य मानते थे, परन्तु यदि किसी को उनके क्रोध से दु:ख होता था, तो बाबा स्वयं उसे मनाते थे। महासागर के जल की तरह बाबा का क्रोध था। जिस तरह महासागर में लहरें केवल सतह पर होती हैं और नीचे तल में शांति होती है, उसी तरह बाबा का क्रोध भी केवल ऊपरी था। अन्दर से तो वे बिलकुल शांत और केन्द्रित होते। वे किसी पर यदि क्रोध करते दिखते तो वे वास्तव में उस व्यक्ति के अवगुणों पर क्रोधित हो रहे होते। किसी व्यक्ति से कभी उनका न तो कोई द्वेष था और न ही कोई दुश्मनी।

बाबा के क्रोध से जुड़ा एक वाक्या यहां बताना चाहूंगा। यह 1911 की बात होगी। जब बाबा उनकी इच्छा के विपरीत मस्जिद में किए गए जीर्णोद्धार से नाराज हो उठे थे। क्रोध में बाबा ने वहां किए जा रहे निर्माण को तोड़ दिया था। तात्या की पगड़ी को जलती अग्नि में फ़ेंक दिया था। तात्या इस पर भी शांत बने रहे और मस्जिद के कार्यों में लगे रहे। यह बाबा की भक्ति का ही प्रताप था। क्रोध शांत होने पर बाबा ने स्वयं एक नया साफा मंगवाकर तात्या के सर अपने हाथों से नयी पगड़ी बांधी।



गुरु की महत्ता से जुड़ा एक किस्सा और है। अन्नासाहेब दाभोलकर यानी हेमाडपंत गुरु की महत्ता को नकारते हुए बाबा के दर्शन को आए थे। वे अल्प-शिक्षित होते हुए भी उच्च पदों पर आसीन होने के चलते अहंकार से भरे हुए थे। वे बाबा में आस्था पल्लवित होने के बाद बाबा की जीवनी लिखना चाहते थे और उसके लिए अनुमति लेना चाहते थे। बाबा ने उन्हें शामा के अनुरोध पर स्वीकृत तो दीलेकिन एक शर्त पर कि अन्नासाहेब को अपना अहंकार छोड़कर उनकी शरण में आना होगा। ऐसा ही हुआ। कहते हैं कि साई की लीलाओं का श्रवण करने-मात्र से उनके भक्तों के दु:ख दूर हो जाते हैं। दाभोलकर के माध्यम से साई द्वारा लिखी गई जीवनी ‘श्री साई सतचरित्र आज दुनिया में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ हो गया है। एक अनुमान के मुताबिक इस ग्रन्थ की  दुनिया की विभिन्न भाषाओं में  सालाना लगभग 5 लाख प्रतियां भक्तों के पास पहुंचती हैं। अहंकार का त्याग अकल्पित ऊंचाई देता है लेकिन त्याग करने से पहले यह अहसास भी गुरु की ही शरण में होता है कि हमारे अन्दर वास्तव में अहंकार है। स्वदोष दर्शन का माध्यम है गुरु की संगत। जब स्वदोष का अहसास हो गया तो फिर दोष दूर होने में समय नहीं लगता।

बाबा भली कर रहे।।
श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु
www.saiamritkatha.com

4 comments: