Tuesday, 30 June 2015

मक्खन-मिश्री अर्पित करो साई को




साई की काकड़ आरती में सम्मिलित होने का अवसर जब भी मिलता है, हर साई-भक्त दोनों हाथों से उसे लपक लेता है. दिल में अनगिनत फरमाइशे लिए हम पुजरिओं को बाबा को निद्रा-लीला से जगाते देखते हैं लेकिन जो भाव उस समय उमड़ते हैं, जो ख़याल मन में घुमड़ते हैं, वो मन धोने का काम करते हैं. काकड़ का व्यवहारिक मतलब होता है आपस में गुंथी हुई रस्सियाँ. हमारी फरमाइशे आपस में उलझ कर काकड़ में जल कर रूप बदल लेती हैं मानो काम, क्रोध, मत्सर, मद को आपस में गूंथ कर काकड़ बनाया और वैराग्य का घी उसमे उड़ेल कर अपनी भक्ति की ज्योत जला दी हो.

उधर पुजारी-सेवादार साई को स्नान करवाते समय बाबा की मूर्ति और उनकी समाधि पर गुलाब-जल मिश्रित पानी डालकर सांकेतिक स्नान की क्रिया में लीन होते हैं, यहाँ हमारे मन से वो दृश्य मैल हटाने का काम कर रहा होता है. साई की मूर्ति और समाधि से जल की धारा जब नीचे रीस कर गिर रही होती है और सेवादार उसे समेटने के अथक प्रयास कर रहे होते हैं कि किसी के पैर के नीचे वो जल ना आ जाए जिससे उसका अपमान हो, हमारे मन में इधर हमारा गुज़रा हुआ कल बह कर निकल रहा होता है. हम उसे समेटने की कोशिश भी नहीं करते. मन से बदले की भावना काफूर होने लगती है. हमारे अन्दर माफ़ी देने का भाव उत्पन्न होने लगता है. हम मन ही मन उन सबको माफ़ कर देते हैं जिनके कारण हमें कभी ना कभी दुःख पहुंचा है. दरअसल किसी को माफ़ कर हम किसी और पर नहीं खुद अपने आप पर अहसान कर रहे होते हैं. दूसरों को माफ़ करके हम स्वयं हल्का महसूस करते हैं.

जब साई की मूर्ति को साफ़ कर, पोंछ कर बाबा का नख-शिख अष्टगंध से श्रृंगारित करने के बाद बाबा को नए वस्त्र धारण करवाए जाते हैं तो मन में हूँक सी उठती है कि दुनिया के सारे वस्त्र साई नाम को धारण करने के आगे गौण हैं और साई नाम का आवरण ओढने से हमारे आचरण में गज़ब का परिवर्तन आ जाता है. साई हमें बदलने लगते हैं.

वस्त्रार्पण के बाद जब साई को पुजारी मुकुट पहनाते हैं तो जो उसकी आभा, छटा होती है, उसको देखकर, भले ही कुछ ही देर के लिए, हम अपने अहंकार से दूर हो जाते हैं. साई का राजाधिराज वाला स्वरुप नज़र आने लगता हैं और हम उनके करोड़ों भक्तों में एक राज-कण के समान. मानो उस देव के आगे हमारी कोई औकात ही नहीं है. और वाक़ई में है भी नहीं.

इन सबके बाद जब एक छोटी आरती, ‘शिरडी माझे पंढरपुर..’ संपन्न होती है और दर्शन कतार प्रारम्भ होती है और जब चारों और से बाबा पर फूलों कि वर्षा होने लगती है तो लगता हैं मानो साई ने हमें इन कुछ पलों में वो सब भी तो दे दिया जो हमने कभी माँगा ही नहीं था. मन में भक्ति की लहरें हिलोरे मारने लगती है. साई के ऊपर से नज़रें हटाने को दिल नहीं करता. उनके सामने लोट-लोट कर भी दिल नहीं भरता. उसके बिना सब कुछ निरर्थक लगने लगता है. साई से प्रेम हो जाता है.

सुरक्षा गार्ड की ‘पुढे चला..(आगे बढिए..)’ पुकार पर हम आगे बढ़ते हैं लेकिन मन साई के चरणों में रखकर.
         
जब हम बाहर निकलते हैं तो द्वार पर खड़े सेवादार को हाथ में एक पतीली से चम्मच भर-भर कर मक्खन-मिश्री का प्रसाद देते सहज ही देखते हैं. वैष्णव परंपरा का विस्तार. हम सहज ही अपनी हथेली आगे बढ़ाते हैं और उस मक्खन-मिश्री के प्रसाद को हाथ में ले अधरों तक ले जाते हैं और उसके स्वाद से भर उठते हैं. मन की सारी कड़वाहट उस प्रसाद की मिठास में धुल सी जाती है. क्या है ये मक्खन-मिश्री? क्यों बांटते हैं इसे?

काकड़ आरती के दौरान हमारे मन का मैल धुल गया है और कुछ देर के लिए ही सही हम  सौम्य, स्वच्छ और स्वस्थ हो गए हैं. हमारा मन उस मक्खन से सदृश हो जाता है. नर्म, साफ़ और मन-माफिक आकार लेने वाला. यह मक्खन सदैव ऐसा ही रहना चाहिए. ताज़ा. बासी मक्खन खट्टा हो जाता है, उसमें से बदबू आने लगती है. सदा अपने मन को मथते रहो, साई के नाम से बिलोते रहो. मन सदा नया बना रहना चाहिए. आखिर मक्खन का एक नाम नवनीत भी तो है. उसमें मिली जो मिश्री है वो है हमारी भक्ति, साई में हमारी प्रीति. निर्लिप्त, निष्कलंक, निष्कपट, निष्काम. मीठी. साई की मस्ती में हमने हमारा ह्रदय बिलो दिया होता है, मथ दिया होता है और उसमे भक्ति की मिश्री मिला कर साई को अर्पण कर दिया होता है और उसके स्वाद से हमारा जीवन परिवर्तन होने लगता है.

यही है वो मक्खन-मिश्री का प्रसाद जो बार-बार ग्रहण करने से साई हमारे और हम साई के हो जाते हैं.

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभं भवतु.

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