Thursday, 25 June 2015

‘मैं’ की क़ैद से निकलो


मैं में मैं समाया सारा,
मै ही मुझको सबसे प्यारा.
अपनों से मुझे दूर यह रखता,
मैं ही टूटता, मैं ही बिखरता.
मैं ने मुझको पकड़ रखा है,
बस बंधन में जकड़ रखा है.
मैं साँझ सवेरे मैं से लड़ता,
मुंह की खाता, गिर-गिर पड़ता.
उठता फिर कि इससे छूंटू,
जान बचाकर इससे भागूं.
मगर ये मुझको नहीं छोड़ता,
बाहर-अन्दर मुझे तोड़ता..


श्री साई अमृत कथा में ‘भाईजी’ सुमीतभाई पोंदा बताते हैं कि जितना प्रबल हमारा अहंकार होता जायेगा, उतना मुश्किल अपने ह्रदय में साई को बिठाना होता जायेगा. अहंकार दरअसल हमारा ही प्रत्यक्ष विस्तार होता है लेकिन हमारे मन-मस्तिष्क से बहुत ज़्यादा ताक़तवर. हमारे सारे अस्तित्व पर छा जाता है और हमारे वजूद पर पूरा नियंत्रण कर लेता है.

हमारा अहंकार हमें वो होने का आभास दे देता है जो हम हैं ही नहीं. सारे फसाद की जड़ वही होता है. हमारे अन्दर इतनी जगह घेर लेता है कि हमारे अपनों के लिए हमारे अन्दर ही कोई जगह नहीं बचती. अपनी नज़र में हम इतने ताक़तवर हो जाते हैं कि हमें लगता है कि दुनिया हम से ही शुरू और हम पे ही ख़त्म हो जाती है. ऐसी खुशफ़हमी हो जाती है कि दुनिया में हमें किसी की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. दूसरों को नीचा देखने लगते हैं, स्वयं को बहुत ऊपर. कोई हमारे सामने टिकता नहीं दिखता. ज़बान में कडवाहट और स्वर में कटुता आ जाती है. अपने ही साथ बहुत मज़ा आने लगता है और दूसरों का साथ ख़लल डालता है. पत्नी, बच्चे, माँ, पिता, मित्र सब दूर होने लगते हैं और आखिर में जब हमें अपनों के दूर हो जाने का अहसास होता है तब हम कितनी ही आवाज़ दें, उनको सुनाई नहीं देती. पश्चाताप में हाथ मलते रह जाते हैं लेकिन दिल से निकलते आंसूं भी उन दूरियों को कम नहीं करते.

जैसे किसी घर में अँधेरा हो, तो मेहमान घंटी नहीं बजाते, वैसे ही जब मन में अहंकार भरा हो तो साईनाथ नहीं आते.

उन्हें दूषित जगह रहना पसंद ही नहीं. उन्होंने दासगणु महाराज का घमंड तोड़ने के लिए ईशावास्य उपनिषद की व्याख्या काकासाहेब दीक्षित की नौकरानी नाम्या की बहन मलकरणी से करवाई. इन्ही दासगणु महाराज के कीर्तन करने के समय पहने जाने वाले कपड़ों पर बाबा ने व्यंग्य कर उन्हे सादगी-परस्त होने का मार्ग दिया. इसी तरह ब्रम्हज्ञान की इच्छा रखने वाले सेठ को उसकी प्राप्ति के लिए पांच प्राण, पांच इन्द्रियां, मन बुद्धि और अहंकार का त्याग करने का उपाय बताया. बापूसाहेब बूटी, बाबू तेंदुलकर और दामू अन्ना के ज्योतिषियों के दंभ को तोड़ उनकी भविष्यवाणी के विपरीत लेकिन कारगर फल दिए तो कहीं नानासाहेब चांदोरकर के पंढरपुर जाने की सूचना से पूर्व यह बात उन्हें बता कर अपने करता होने का परिचय दिया.

दरअसल, साई की खासियत है कि वो हमें हमारी औकात से ज़्यादा देता है. हम पर इतनी कृपा करता है कि हम भूल जाते हैं कि साई हमारी परीक्षा ले रहा है. वो हमें और भी ज़्यादा देने से पहले परखना चाहता है कि हम उसकी कृपा के लायक है भी कि नहीं. इस परीक्षा में भी वो हमारी सहायता करता है, इशारे से सुझाता है. यह हम पर है कि हम उसका इशारा समझ सके.

साई को अपने मन में जगाना ही साई को पाना है जो कुछ भी और पाने से बहुत ज़्यादा है. सवाल यह है कि वो तो देना चाहता है लेकिन क्या हम लेने के लिए तैयार हैं? सोचें.

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभं भवतु.

No comments:

Post a Comment