Monday, 16 March 2015

सोच पवित्र हो, तो बाबा हर मुराद पूरी करते हैं..

मन से मांगो सब मिले; और जीवन बने सफल।
बाबा का उपकार हो, मन माफिक मिलता फल।

जो सपने देखते हैं और उन्हें साकार करने की दिशा में अग्रसर हो जाते हैं, वे जीवन में सफल हैं। अगर आपकी नीयत साफ है नियति भी अच्छी ही होगी। हम मंदिर जाते हैं क्यों? ताकि हमारा मन दूषित भावनाओं से बचा रहे। बाबा के पास भी हजारों/लाखों लोग इसी उद्देश्य को लेकर पहुंचते रहे और आज भी शिर्डी रहे हैं। साई की महिमा अपंरपार है। वे अपने भक्तों से ऐसे मिलते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं, जैसे जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। बाबा के दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। अगर आप सच्चे मन से बाबा से कुछ मांगते हैं, तो यकीनन आपकी मनोरथ पूरी होगी। ऐसे ही कुछेक किस्से आपसे शेयर करता हूं।

एक थे होलकर, जो औरंगाबाद में रहते थे। उनकी पहली पत्नी से एक बेटा था। दूसरी शादी को करीब 20 साल होने को आए थे, लेकिन संतान का सुख नहीं था। उन्हें एक बच्चे की और कामना थी। एक रोज उनकी पत्नी सौतेले बेटे के साथ बाबा के दर्शन करने आईं। कई दिन वह शिर्डी में रहीं, लेकिन बाबा से इल्तजा नहीं कर पाईं। दरअसल, बाबा के दरबार में भीड़ ही इतनी रहती थी। आखिरकार उन्होंने श्यामा से कहा, बाबा से दरख्वास्त कर दो कि, मेरी गोद भर जाए। श्यामा तो बाबा पर जैसे अधिकार-सा रखते थे। श्यामा ने श्रीमती होलकर ने कहा, चलो मेरे साथ बाबा के पास ऊपर चलो। वे उन्हें मस्जिद में ले गए।
 
Shama
श्रीमती होलकर पूजा की थाली में एक नारियल भी लेकर आई थीं, जो बाबा को अर्पण कर दिया। बाबा ने सहजता भाव से नारियल उठाया और उसे कान के पास बजाया। उसमें पानी था। बाबा ने कहा, यह तो गुडगुड करता है। श्यामा ने तुरंत कहा, बाबा इस बाई के पेट में भी बच्चा ऐसे ही गुडगुड़ करना चाहिए। बाबा ठहरे अंतरयामी। उन्हें श्यामा से ऐसे ही जवाब मिलेगा, ठीक से पता था। लेकिन उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में श्यामा को झिड़कते हुए कहा, चल हट! कोई फकीर को आकर नारियल चड़ा देता है, तो क्या उसको बच्चा होने लगता है?

श्यामा यह अच्छे से जानते थे कि बाबा का स्वभाव ऐसा ही है। वे हठी बच्चे की तरह बोले, बाबा तुम्हें इस बाई की मुराद पूरी करनी होगी। बाबा ने कहा, मैं तो तोड़ के खाऊंगा नारियल। श्यामा बोले, नहीं; मैं तोडऩे नहीं दूंगा, जब तक तुम इस बाई की मुराद पूरी नहीं करते। बाबा मुस्कराए, ठीक है भई एक साल के अंदर इस बाई की मुराद पूरी हो जाएगी। श्यामा का बाबा पर अधिकार देखिए; उन्होंने मुस्कराते हुए श्रीमती होलकर से कहा, अगर एक साल में तुझे औलाद नहीं हुई, तो मैं यह नारियल इसी बाबा के सिर पर तोड़ दूंगा। इस बात को धीरे-धीरे समय होता गया। एक साल बाद श्रीमती होलकर अपने बच्चे के साथ बाबा का आशीर्वाद लेने पहुंची। बाबा ने उनकी मुराद पूरी कर दी थी।

बाबा कभी भी अपने भक्तों को निराश नहीं करते। बाबा इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि उनके पास कौन; किस मंशा से उनके पास आया है। बाबा उनका मन परख लेते हैं। अगर सामने वाली की मनोरथ बाजिब है; नीयत साफ है; तो वे उसकी झोली में खुशियां अवश्य भरते हैं। श्रीमती होलकर अपनी गोद में बच्चे की आस को लेकर व्याकुल थीं। बाबा ने उनकी आस पूरी की; क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि; श्रीमती होलकर का मन साफ है।

अगर मन साफ हो; तो फटे-पुराने कपड़े-लत्तों में भी आपका तेज चमकेगा

साधू-संत; ऋषि-मुनी अपने बाहरी आवरण पर नहीं; आचरण को साफ-सुथरा बनाने में प्रयासरत रहते हैं। बाबा को जिस-जिसने भी पहली मर्तबा देखा; उसे ख्याल आया-अरे यह तो संत तो फटे-पुराने कपड़ों में रहता है? बाद में जब वो बाबा के सानिध्य में जाता, तो भाव बदल जाता-कितनी अद्भुत लीला है, इस संत की; जो खुद फटे कपड़ों में रहता है, लेकिन दूसरों की फिक्र हमेशा बनी रहती है। जब बाबा की कफनी में जगह-जगह छिद्र हो जाते, तब भी वे उसे बदलने में कोई रुचि नहीं दिखाते थे। तात्या; जो बाबा के प्रिय थे, वे बाबा के फटे कपड़ों में उंगली डालकर उसे चीर देते थे। इसके बाद बाबा के पास कोई चारा नहीं बचता था। यानी नई कफनी बनवानी ही पड़ेगी। 
 
Baba Ki Kafni
काशीराम शिंपी बाबा की कफनियां सिलता था। मोटे खद्दर जैसे कपड़े की कफनियां सिलवाते थे बाबा; वो भी एक नहीं; एक साथ 4-5 लेकिन कभी भी उन्होंने काशीराम से मुफ्त में काम नहीं कराया। कभी उन्होंने यह नहीं कहा, शिंपी मैं तुझे मेहनताना नहीं दूंगा। कफनी आती और शिंपी जो मांगता; बाबा उसे वह मेहनताना दे देते। 
Shri Kashiram Shimpi

तब की एक कहानी...
इसी काशीनाथ से जुड़ीं कई और भी कहानियां हैं, जो बाबा के चमत्कार के रूप में सामने आईं। काशीनाथ पेशे से दर्जी था, इसलिए उसके नाम के पीछे दर्जी भी लगता था। ये कहानियां हिमाडपंत के ग्रंथ श्री साई सदचरित के हिंदी अनुवाद में नहीं है, जिसे श्री शिवराम ठाकुर ने किया है। मालसापति काअभिन्न मित्र था काशीनाथ। शिर्डी के पास एक गांव में नियमित हाट लगती थी। काशीनाथ वहीं से सिलने के लिए कपड़े खरीदकर लाता था। एक बार उसे काशीनाथ हाट से लौट रहा था। उसके पास खूब-सारा माल था, जो उसने अपने घोड़ों पर लाद रखा।

काशीनाथ अपनी मस्ती में चला रहा था, अचानक लुटेरों ने हमला कर दिया। लुटेरों ने डरा-धमकाकर काशीनाथ से सबकुछ छीन लिया जो वह हाट से ला रहा था, लेकिन वो एक पोटली देने को तैयार नहीं था। पोटली उसने अपने हाथों में कसकर पकड़ी हुई थी। उस पोटली में कोई कीमती चीज नहीं थी, फिर भी काशीनाथ ने उसके लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। पोटली में तो शक्कर का बुरादा था, जिसे वो चीटियों को डालने लाया था। काशीनाथ ने लुटेरों से कहा, मैंने तुमको सबकुछ दे दिया, लेकिन इस पोटली को हाथ नहीं लगाने दूंगा। 

लुटेरों को लालच गया कि; जरूर पोटली में कोई बेशकीमती चीज होगी, वर्ना यह आदमी अपनी जिंदगी दांव पर क्यों लगाता? लुटेरों ने काशीनाथ से पोटली छीननी चाही, लेकिन वो अड़ गया। लुटेरों ने उसे मारना-पीटना शुरू कर दिया। काशीनाथ अधमरा हो गया। तभी एक लुटेरे ने उसके सिर पर कुल्हाड़ी दे मारी। काशीनाथ सारी रात मरणासन्न वहीं पड़ा रहा। सबेरा हुआ, तो गांववालों की दृष्टि उस पर पड़ी। वे उसे उठाकर वैद्य के पास ले जाने लगे। काशीनाथ उस वक्त थोड़े-से होश में था। वो बोला, मुझे तो मेरे बाबा के पास ले चलो। गांववालों को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब घायल काशीनाथ अपनी बात पर अड़ा रहा, तो मजबूरन लोग उसे बाबा के पास ले आए। लुटेरों ने काशीनाथ को बुरा मारा-पीटा था। खासकर कुल्हाड़ी का वार काफी गहरा था। बहुत खून बह चुका था। बाबा ने तुरंत उसका देसी इलाज शुरू किया। कु दिनों में काशीनाथ के जख्म भर गए और वो चलने-फिरने लगा।

लोग बताते हैं कि, जिस रात लुटेरे काशीनाथ को पीट रहे थे, मस्जिद में लेटे बाबा चिल्ला रहे थे, मुझे मत मारो। मत मारो। यह बाबा का चमत्कार ही था कि, आखिरकार लुटेरे काशीनाथ को जिंदा छोड़कर चले गए। इतने गहरे जख्म होने के बावजूद काशीनाथ जिंदा बच गया, यह भी बाबा का ही चमत्कार था।

कहते हैं कि; होनी को कोई नहीं टाल सकता; ईश्वर भी नहीं। ईश्वर के हाथ में सबकुछ है, वो चाहे तो वक्त रोक दे, लेकिन वो ऐसा नहीं करता। अगर ऐसा कर दिया, तो सारे चक्र रुक जाएंगे। इसलिए बाबा ने काशीनाथ के साथ होने वाली घटना तो नहीं टाली, क्योंकि वो उसकी किस्मत में लिखी थी, लेकिन उसे बचा जरूर लिया। अगर बाबा का प्रताप होता, तो काशीनाथ का बचना नामुमकिन था। बाबा उसकी ऊपर सुरक्षा कवच बनकर जा लेटे थे,इसलिए बाबा रात में चिल्ला रहे थे, मुझे मत मारो।


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