Friday, 12 February 2016

साई बाबा का पहला वचन


 जो शिर्डी में आएगा, आपद दूर भगायेगा
श्री साई अमृत कथा में बाबा के 11 वचनों में से पहले का विस्तार करते हुए सुमीतभाई पोंदा ‘भाईजी’ बताते हैं कि साई बाबा के 11 वचनों में से पहला वचन है, “जो शिर्डी में आएगा, आपद दूर भगायेगा.” यह वचन साई का उद्गार भी है और आश्वासन भी. यह वचन साई बाबा के भक्तों की अध्यात्मिक उड़ान में सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से उसके तन से प्रारम्भ हो रही शिर्डी की यात्रा अंतिम वचन तक पहुँचते-पहुँचते मन की यात्रा बन जाती है.
अपने फ़ायदे के लिए साई के दर पर हर बार जाकर मांगने और मांगने से अधिक पाने वाला आम इंसान, जब मांगते-मांगते थक जाता है और साई देते-देते नहीं थकता, तब वह साई से वो सब कुछ मांगने लगता है जो साई उसे हमेशा से ही देना चाहते थे लेकिन जो वह लेने के लिए कभी तैयार ही नहीं था. श्री साई सच्चरित्र के अध्याय 32 में साई कहते भी तो हैं, “मेरे सरकार का खज़ाना भरपूर है और वह बह रहा है. मैं तो कहता हूँ कि खोदकर गाड़ी में भर कर ले जाओ. जो सच्ची माँ का लाल होगा, उसे स्वयं ही भरना चाहिए.” ये कौन-सा खज़ाना है जो साई हमेशा से ही अपने भक्तों को देना चाहते हैं? ख़ज़ाने से साई का अर्थ आध्यात्मिक भंडार से है.

आपदाएं या विपरीत परिस्थितियां जीवन का एक अभिन्न अंग हैं. जीवन सुख-दुःख, ख़ुशी-ग़म, अच्छे-बुरे, ग़लत-सही जैसी परिस्थितियों का सम्मिश्रण है. हर दिन एक जैसा नहीं होता. अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर चलती ही रहती हैं. कर्म के सिद्धांतों की बात करें तो यह भी स्पष्ट हो ही जाता है कि अच्छी और बुरी, दोनों ही परिस्थितियां इंसान के ही कर्मों का फल होती हैं. श्री साई सच्चरित्र के अध्याय 32 में साई आगे कहते हैं, “जो कुछ भी कोई करता है, एक दिन उसका फल उसको अवश्य प्राप्त होगा और जो मेरे इन वचनों को याद रखेगा, उसे मौलिक आनन्द की प्राप्ति होगी.” अच्छे के बदले अच्छा होता है और बुरे के बदले बुरा अनुभव मिलता है. कर्म करने को इंसान स्वतंत्र है.
जब तक कर्म नहीं हुआ है तब तक कर्म इंसान का ग़ुलाम है लेकिन एक बार जब कर्म हो गया तब इंसान कर्म का ग़ुलाम हो जाता है. किये हुए कर्म का फल उसे भोगना ही पड़ता है. कर्म के फल का निर्धारण कर्म की प्रबलता और तीव्रता पर निर्भर करता है. फल का निर्धारण उस अदृश्य शक्ति के हाथों में हैं जिसे हम ईश्वर कहते हैं. उसके न्याय की रीत निराली है. कर्म से, किन्ही परिस्थितियों में भी छुटकारा नहीं है.
जीवन मिला है इसलिए कर्म करना हैं और चूंकि कर्म होते है, इसलिए उन्हें भोगना, उनका फल भोगना हमारी मजबूरी है. जो कर्म अभी हुए नहीं है और जिनके हम मालिक हैं, वे क्रियमाण कर्म कहलाते हैं. जो कर्म हमारे द्वारा हो चुके हैं लेकिन जिनका फल निर्धारण अभी नहीं हुआ है, वो संचित कर्म कहलाते हैं. जो कर्म हो चुके हैं और जिनके फल का निर्धारण भी हो चुका है और जो हमें भोगने ही है, वे प्रारब्ध कहलाते हैं. प्रारब्ध में जिन कर्मों के फल असुखकारी हैं, उन्हें आपदा समझा जाता है.    
जब कोई यह पहला वचन पढ़ता है तो उसे सहज ही यह महसूस हो उठता है कि उसकी सारी आपदाएं शिर्डी में आते ही समाप्त हो जायेंगी. लेकिन क्या इस वचन का महज इतना-सा ही अर्थ है? श्री साई सच्चरित्र के अध्याय 25 में दामू अन्ना कासार के बाबा को पूछे सवाल से इसका जवाब मिल जाता है. दामू ने बाबा से पूछा था कि जो सभी जन बाबा के दर्शनों के लिए शिर्डी आते हैं, क्या उन सभी को लाभ पहुँचता है? इसके जवाब में बाबा ने कहा, ”बौर लगे आम वृक्ष की ओर देखो. क्या सभी बौर आम में तब्दील हो जाते हैं. कुछ बौर तो अपने आप झर जाते हैं और जो बचते हैं उनमें से भी कुछ आंधी के झकोरों से नष्ट हो जाते हैं और उनमें से कुछ ही शेष रह जाते हैं.”
इस वक्तव्य से बाबा का क्या अभिप्राय था? मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि जब शिर्डी जाने वाले हर व्यक्ति को वहाँ जाकर फ़ायदा ही न हो तो क्यों कोई शिर्डी जाएगा! बाबा के कथन को अगर समझने की कोशिश करें तो समझ में आता है कि किसी का भी शिर्डी आना किसी बौर के आम बनने जैसा ही तो है.
कहा गया है कि ईश्वर की याद विपदा के समय ही आती है. विपदा टल जाने पर आमतौर पर इंसान ईश्वर को भूल जाता है. ऐसे अवसरवादी को दुःख फिर ढूंढ ही लेता है या ऐसा इंसान खुद ही अपने दुःख को ढूंढ लेता है. जो आनंद के समय भी ईश्वर को याद करते रहते हैं, उन्हें दुःख तो आ सकता है लेकिन दुःख उन्हें दुखी नहीं करता. ऐसे ही शिर्डी की यात्रा शुरू करने से पहले ही कई भक्तों का मन बदल जाता है और वह शिर्डी पहुँच ही नहीं पाते. मन की अल्हड़ प्रवृत्ति चित्त को भटका देती है. इनमें से कुछ अगर शिर्डी पहुँच भी जाते हैं तो भी उनमें से कई तो केवल तन से शिर्डी में होते हैं. उनका मन तो भटकता ही रहता है. कोई नौकरी के बारे में सोचता है तो कोई व्यापार और परिवार के बारे में. फ़ायदे-नुकसान के घट-जोड़ में लगा मन उस तन को भी शिर्डी में ठहरने नहीं देता. भटकता मन, इनके तन की शिर्डी में उपस्थिति को नगण्य कर देता है. इन बौरों में तो आम बनने के गुण होते ही नहीं. 
जैसे कुछ बौर स्वयं ही झर जाते हैं वैसे ही शिर्डी आने वाले कुछ भक्त तुरंत ही अपनी समस्या का समाधान नहीं मिलने के कारण अपने आप शिर्डी आना छोड़ देते हैं. उन्हें शायद इस बात का भास ही नहीं होता है कि हर समस्या का समाधान तुरंत ही नहीं मिल जाता. साई से चमत्कारों की उम्मीद रखने वालों को इस बात का ज्ञान ही नहीं होता है कि चमत्कार साई नहीं करते बल्कि साई में हमारी श्रद्धा साई को चमत्कार करने में मजबूर करती है और यह रातोंरात नहीं होता. किसी भी शक्ति पर भरोसे को विश्वास में, विश्वास को आस्था में और आस्था को श्रद्धा में बदलने में समय लगता है. आस्था और श्रद्धा के रास्ते में तर्क खड़ा नज़र आता है.
आस्था और तर्क दोनों एक ही दिशा में साथ-साथ चलते हैं लेकिन कभी रेल की पटरियों की तरह मिलते नहीं. दोनों में होड़ रहती है. तर्क आस्था को आगे बढ़ने नहीं देता और आस्था तर्क को परास्त करना चाहती है. तर्क विवाद को जन्म देता है और आस्था विश्वास को. तर्क कारण ढूंढता है और आस्था कारण से परे नए आयाम ढूंढती है. तर्क मन को कमज़ोर करने का काम करता है तो आस्था विश्वास को दृढ़ करती है. तर्क चमत्कारों को नकारता है. चमत्कार आस्था को नमन करते हैं. तर्क सत्य की खोज में लगा रहता है. आस्था सत्य का ही रूप है. तर्क दिशा देता है तो आस्था गति. तर्क अशांत करता है तो आस्था शांति देती है. तर्क मायूस करता है, आस्था उल्लास से भर देती है. साई में आस्था हो तो तर्क ठहरता ही नहीं क्योंकि साई तर्कों से परे हैं. साई को खोजना है तो तर्कों से परे जाकर ही खोजना होगा.
शिर्डी श्रद्धा है तो साई में भक्ति सबुरी यानि सब्र है. आस्था शिर्डी यानि श्रद्धा का रास्ता खोलती है. अगर हमें चमत्कार नहीं दिख रहा है तो कमी साई में नहीं बल्कि हमारी श्रद्धा में ही है. साई तो देने को तैयार बैठा है. लेने वाले में लेने की क़ाबिलियत तो हो. लायकात होने पर ही इच्छा फलीभूत होती है. जो बौर इस क़ाबिलियत के साथ आस्था की राह पकड़ लेते हैं, उनके आम बनने में एक बाधा और कम हो जाती है. लेकिन अभी भी भक्ति की मासूम टहनी से उनका रिश्ता कच्चा ही रहता है. ज़रा सब्र तो कर, प्यारे!
जैसे ऐसे कमज़ोर रिश्ते से चिपके कुछ बौर तेज़ हवाओं और अंधड़ में झर जाते हैं वैसे ही कुछ और भक्त मोह और लालच के चलते साई को खो देते हैं. कुछ वैमनस्यता और इर्ष्या के अंधड़ में साई से दूर हो जाते हैं. कामेच्छा की प्रबलता मन को साई में टिकने ही नहीं देती. मन की ग्रंथियों के तूफ़ान में ये बौर भी भक्ति की मासूम टहनी में टिक ही नहीं पाते और झर जाते हैं. अब जो बच जाते हैं, वे आम बनने की राह में बढ़ जाते हैं.
शिर्डी का पुरातन नाम ‘शिलधी’ है. समय के साथ ‘शिलधी’ के अपभ्रंश के रूप में अधिक आसान, शिर्डी प्रयुक्त होने लगा. साई बाबा की अष्टोरशत नामावली में पांचवे स्थान पर बाबा का एक नाम “गोदावरीतट शिलधीवासिनै:” बताया गया है. गोदावरी के तट पर बसी शिलधी का वासी! ‘शिलधी’ को अगर दो हिस्सों में कर देते हैं तो “शिला+धी” बनता है. ‘शिला’ का एक अर्थ मेरु या पहाड़ भी होता है और ‘धी’ का अर्थ ज्ञान हुआ.
स्थान का बल प्रधान होता है. इस प्रकार से शिर्डी का बल भी प्रधान हुआ. हमारे शास्त्रों में अधिकांश देवी-देवताओं का स्थान ऊंची जगहों पर ही होता है. इस अर्थ से शिर्डी भी एक पहाड़ हुई. वो पवित्र, पावन, ऊंचा और अडिग पहाड़ जिसने देविदास, जानकीदास, आनंदनाथ, कई सूफ़ी यायावर इत्यादि, कई संतों को और बाद में, संतों के संत, परमहंस श्री साईनाथ को अपनी ओर खींच लिया. शिर्डी में कोई तो चुम्बकीय तत्त्व है जिसने इतने संतों के तप से पाए पुण्य को अपने अन्दर समाहित कर रखा है.
शिर्डी जाना या शिर्डी में आना किसी मेरु या पहाड़ पर चढ़ने के बराबर ही होता है जहाँ से दुनिया एक अलग रूप में लेकिन छोटी नज़र आती है और नज़रें दूर तक देख सकती हैं. दृष्टिकोण बदल जाता है. जहाँ हवा शुद्ध और ताज़ी होती है लेकिन अंतर को कपकपां भी देती है. उसके वेग के सामने पैर जमा कर खड़ा होना भी चुनौतीपूर्ण होता है. इस जगह सूर्य का प्रकाश अधिक ऊर्जावान लेकिन उसका निर्दयी ताप और अधिक पास होता है और वैसे ही चंद्रमा की शीतलता भी पास लेकिन जड़ कर देने वाली होती है. तारों की टिमटिमाहट साफ़ दिखती है लेकिन उनकी नीरसता मन को उदास कर देती है.
इस पहाड़ पर चढ़ना आसान नहीं होता. चढ़ाई एकदम खड़ी है. बिलकुल सीधी. पैर जमाने को कोई जगह नहीं. पकड़ने को कोई सहारा नहीं. दम भरने लगता है और सांस फूलने. शिर्डी में साई तक पहुँचने के लिए कई कड़ी परीक्षाएं देनी होती है. आराम करने रुके तो मन के विचार नीचे की गहराई देख कर चक्कर खाने लगते हैं.  
श्री साई सच्चरित्र के अध्याय-2 में दाभोलकरजी को गुरु की महत्ता समझाने के लिए बाबा ने ऐसी ही ऊँचाई पर पहुंचने के लिए ऐसे ही रास्ते का का ज़िक्र किया है. पथ-प्रदर्शक के साथ होने से हाँफते, गिरते-पड़ते, दुरूह, कठिन और काटों भरे रास्तों से होकर, जीव-जंतुओं से बच कर जो ऊपर पहुँच जाता है, उसे ज्ञान यानि आपदाओं से मुक्ति मिल जाती है. वो ऐसी जगह पहुँच जाता है जहाँ पर दुःख दुखी कर निराश नहीं करता और जहाँ मन सुखी होने पर निरंकुश होकर उड़ान नहीं भरता.
दृष्टिकोण बदलने से ममता की जगह समता का भाव उत्पन्न हो जाता है. साई की ऊर्जा का तेज अपने चेहरे पर नज़र आने लगता है और वहीँ उसकी चाँद जैसी शीतलता ओज बढ़ा देती है. साई की आँखों के तारों की चमचमाहट नए ब्रह्मांडों, जीवन में नए आयामों की खोज का रास्ता खोलती है. भटकते हुए मन को रास्ते और मंजिल दोनों ही नज़र आने लगते है.
साई के साथ होने से उनकी साँसों के सुगन्धित झोंके जहाँ पर नयी आशा का संचार करते हैं. यहाँ मन के विकार रूप बदल लेते हैं. काम शास्त्रोक्त हो जाता है. क्रोध अपनी कमजोरियों पर आने लगता है. लोभ साई के चरणों का होने लगता है. साई की भक्ति की मस्ती का रंग चढ़ जाता है. यह शिर्डी है जहाँ आपदाएं निकल भागने का रास्ता खोजती है. कर्मों के प्रतिकूल प्रभाव सद्गुरू साई के श्रीचरणों में जाने से क्षीण पड़ने लगते हैं.
भाव बदलने से विचार और विचारों में परिवर्तन से कर्मों में बदलाव होने लगता है. क्रियमाण कर्म अच्छे होने से उनका प्रभाव भी बदल जाता है. संचित कर्मों के फल का स्वरुप बदलने लगता है. प्रारब्ध को झेलने की शक्ति मिलती है. साई के ताप से कर्मों का स्वरुप बदलने लगता है.
सोने को तपाने पर वह कुंदन बन जाता है. उसकी मिलावट, अशुद्धता उसके तप कर लाल हो जाने पर दूर हो जाती है. वैसे ही शिर्डी वो स्थान है जिसे साई ने दो अलग-अलग पड़ावों में कोई 63-64 वर्ष तक अपने तप और ताप से प्रबल किया. जहाँ उन्होंने मानवता की परिभाषा को साफ़ कर उस पर से धूल हटा दी. धर्म और अधर्म का भेद बताया. जहाँ साई ने न जाने कितनों की ही तकलीफें दूर की, और जिनका प्रारब्ध उनके सुख के आड़े आ रहा था, साई ने उनके दुखदायी अहसासों को हर लिया. जहाँ साई ने लोगों के जीवन में आशा की नयी किरण जगाई और जहाँ साई ने अपनी अनवरत जलती धूनी की राख से मुर्दों को भी जीवनदान दिया.
शिर्डी वह जगह है जहाँ की मिटटी में अनगिनत भक्तों की आशा का केंद्र बन चुके साई का पंचतत्वों से बना शरीर विश्राम कर रहा है, वहां की मिटटी से एकाकार हो चुका है. साई शिर्डी बन चुके है या शिर्डी साई हो चुकी है, यह भेद करना नामुमकिन है. जिस मिटटी की ऊर्जा साई के नाम में बसी हुई है, उस शिर्डी में आपदाएं कहाँ ठहर सकती हैं. ज़रुरत है तो साई में बिना शर्त समर्पण की. यही शिर्डी आने की शर्त है और योग्यता भी.

शिर्डी में आकर आपदा उन्हीं की दूर होती है जो आस्था की मुश्किल राह पर चलते हुए श्रद्धा के रूप में साई को पाने की ख्वाहिश रखते हैं. शिर्डी में बैठे, साई पूरे विश्व में अपने भक्तों की आपदाएं हटाने का काम सहज ही करते हैं. साई तक पहुँचने में यही पहला पड़ाव सबसे अहम भी है और मुश्किल भी.        

    बाबा भली कर रहे।।

श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु

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