Wednesday, 2 March 2016

मैं तो ईश्वर का दास हूँ..


अपनी तमाम पारलौकिक शक्तियों और लोगों को लाभ पहुंचाने की अदम्य क्षमता साई को ईश्वर के समकक्ष दिखाती है लेकिन स्वभाव के सरल साई ने सदा अपने आप को ईश्वर का दास ही माना. उन्होंने कभी भी अपने आपको भगवान् या ईश्वर नहीं माना और न ही कभी किसी से कहा कि उन्हें भगवान् या ईश्वर माना जाए. श्री साई अमृत कथा में ‘भाईजी’ तो बताते हैं कि साई तो इतने सरल स्वभाव के थे कि वे तो कभी-कभी अपने आप को दासानुदास भी कहते यानि भक्तों के भी दास. दासगणु महाराज से तो साई कहते कि वे (साई) उनके (दासगणु) के ऋणी हो गए है क्योंकि दासगणु बाबा की तारीफ़ में भजन, इत्यादि करते, लोगों को बाबा के बारे में बताते और बाबा की ख्याति लोगों तक पहुंचाते. सदा ही ईश्वर या अल्लाह का नाम उनके होठों पर रहता. वे सदा अनंतता को निहारते. मानो ईश्वर को ही देख रहे हों. सदा लोगों को ईश्वर का ध्यान करने को उत्प्रेरित करते रहते. साई वास्तव में एक भक्त ही थे जो ईश्वर से भक्ति मार्ग पर चलते हुए एकाकार हो गए थे.

ईश्वर में प्रीति का नाम ही भक्ति है. जब ईश्वर का नाम लिए बिना चैन न पड़े, जब ईश्वर का ज़िक्र सुन कर मन को आनंद का अनुभव हो, जब ईश्वर की ही बातें करने को दिल चाहे, ईश्वर का ही ध्यान हर समय रहे, ईश्वर के पास बैठने की इच्छा सदा बनी रहे, आँखें हर पल ईश्वर के दर्शनों के लिए तरसती रहे तो मान लें कि हमें ईश्वर में प्रीति हो गयी है. जब अपने इष्ट के जैसे ही बर्ताव करने की कोशिश करें और जब हम उनके गुणों को आत्मसात करने का प्रयत्न करें, तो मान लें कि हम भक्त हो रहे हैं.
जिसके मन में करुणा न हो वह कभी भी भक्त नहीं हो सकता. पत्थर जैसा मन हो तो भक्ति उसमें प्रवेश कैसे करेगी? मन में संवेदनशीलता का होना करुणा का परिचायक है. पत्थर पर तो पानी भी नहीं ठहर सकता. दूसरों के सुख-दुःख से अप्रभावित व्यक्ति पत्थर होता है. करुणा मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न करती है. दूसरों के सुख से दुखी होने वाला ईर्ष्यालु होता है. दूसरों के दुःख से सुखी होने वाला दुश्मन होता है. किसी और का सुख देख कर जो सुखी होता है वह सज्जन कहलाता है और किसी और का दुःख देख कर दुखी होने वाला साधु माना जाता है. वहीँ दूसरों के सुख को जो बढ़ा देता है और दुःख को कम करने का प्रयास करता है, वह संत कहलाता है. जैसे हमारे साई. संत के रोम-रोम में करुणा का वास होता है. साई ने न सिर्फ अपने जीते जी लोगों के दुःख दूर किये और सुखों को बढ़ाया बल्कि आज जब साई को समाधीस्थ हुए लगभग सौ साल होने को आ गए हैं तब भी साई अपनी शरण में आये लोगों का सुख बढ़ाते और दुःख कम करते ही दिखते हैं. साई करुणामयी हैं और रहेंगे.
सहयोग और सहकार भक्त के हाथों का वैभव होते हैं. जो दूसरों के प्रति सहयोगात्मक रवैया रखता हो और जो दूसरों की मदद करने को सदैव तत्पर रहता हो, वही भक्ति की भावना को सुशोभित करता है. दूसरों के माथे पर लगाने के लिए जब हम चन्दन घिसते हैं तो दूसरे के माथे को तो वह बाद में ठंडक देता है, हमारी उँगलियों को पहले ठंडा कर उनमें अपनी सुगंध भर देता है. दूसरों की मदद करते-करते हम ख़ुद महकने लगते हैं. परोकारी की आभा ही निराली होती है. वह उसके चेहरे पर अलग ही दिखती है. साई परमयोगी थे. शरीर, आत्मा और चित्त पर उनका अद्भुत नियंत्रण था. योगी होने का रास्ता सहयोगी होने से ही बनता है. औरों के साथ रह कर जो कार्य करे वही सहकारी कहलाता है. जो दूसरों के साथ रहकर भी अपने शरीर, आत्मा और मन पर पूरी तरह नियंत्रण रख उनके उद्धार का रास्ता बनाता चलता है, वह सहयोगी बन जाता है.
इसी तरह जो दूसरों के काम आता है वह उपयोगी होने की राह से योग-तत्त्व को पा लेता है. मीलों दूर धौकनी धौंक रही लुहारन का बच्चा जब आग में गिरता है और साई अपने हाथ की परवाह किये बिना धधकती धूनी में अपना हाथ डालकर उस बच्चे को बचाते हैं तो साई दिखाते हैं कि उन पर जो भी अनन्य भाव से आश्रित होगा, साई उसके भले के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देंगे. कोई आश्चर्य नहीं कि साई ने सहकार, सहयोग और उपयोग के रास्ते योगी होने का रास्ता बना लिया.   
विवेक भक्त के माथे की बिंदिया होता है. सत्य और असत्य में भेद करने की कला को हम विवेक कह सकते हैं. अच्छे और बुरे में जो भेद कर सके वही सच्चा भक्त होता है. जो मनुष्य विवेकशील न हो भक्ति कभी उसे अपने माथे पर बिठाती ही नहीं है. साई ने सदा ही सत्य का साथ दिया. सदा ही उन्होंने दंभी और अहंकारी को ठुकराया और जब तक वे प्रायश्चित करने की दृढ़ इच्छा के साथ साई की शरण में नहीं आये तब तक बाबा ने उन्हें अपने पास फटकने नहीं दिया. कभी भी किसी के छल और कपट को बाबा ने बढ़ावा नहीं दिया और न ही किसी को नुकसान पहुंचाने वाली मंशा को उन्होंने प्राश्रय ही दिया. साई ने सदा ही अच्छे विचारों और अच्छाई फैलाने वाले कर्मों को बढ़ावा दिया.    

सदाचरण और सरलता भक्त के पैरों को दिशा देते हैं. जिसके आचरण में अच्छाई नहीं है वह कदापि भक्ति की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता. वह तो शुरू में भक्ति-मार्ग में लड़खड़ा जायेगा. जिसके मन में लोभ, मोह, इर्ष्या और काम हो, जिसके मन में क्रोध भरा हो, जिसकी ज़ुबान में कटुता हो, वह कभी भी ईश्वर के नज़दीक जा ही नहीं सकता. वह तो हमेशा ही भटक जायेगा. भक्ति मार्ग सीधा और खड़ा है. सदाचरण से ही पैर इस मार्ग में टिके रह सकते हैं. सरलता पर भक्ति चलती है. भक्त सरल होना चाहिए. भोला. उसके मन में कपट का कोई स्थान नहीं होता. सरल स्वभाव वाला हमेशा ईश्वर के नज़दीक होता है क्योंकि उसको हमेशा इस धरती की प्रत्येक कृति में ईश्वर की सत्ता के ही दर्शन होते हैं. यही साई बाबा का भी हाल था. उन्हें प्रत्येक मनुष्य में परम तत्त्व के ही दर्शन होते थे. स्वभाव में सरलता उनके दैनिक कार्यकलापों से झलकती थी. भिक्षा पर ही गुज़ारा करना. फटे कपड़े पहनना और उन्हें अपने ही हाथों से सिलना. स्वयं फुलवारी को सींचना. यहीं से बाबा के स्वभाव की सरलता का पता चलता है. चाहते तो शहंशाहों की तरह बर्ताव कर सकते थे लेकिन सदा ही ऐच्छिक दरिद्रता को ओढ़े रहते.
सहृदयता भक्ति की ख़ुशबू होती है. सहृदयता तो साई की आँखों में प्रत्येक क्षण दिखती. आश्रितों का दिल उनकी धड़कन में सुनाई देता. कभी किसी को निराश नहीं करते. साई का ध्यान करते ही निराशा में उम्मीद का सूरज उगने लगता है. किसी का भी दर्द उनकी शरण में आकर घुल जाता है. जिनका दर्द नहीं घुलता, साई उनकी तकलीफ़ कम ज़रूर कर देते हैं और जिनके कर्म दर्द भोग कर ही शांत होने हैं, साई उनके दर्द के अहसास को कम ज़रूर कर देते हैं. साई की शरण से कभी कोई भी निराश नहीं लौटा है.
साई ने भक्ति को परिभाषित किया या भक्ति ने साई के रूप में अपने आप को जिया, यह समझना मुश्किल है लेकिन भक्ति को जीते-जीते साई स्वयं ईश्वर से इतने घुल-मिल गए कि जैसे दूध में शक्कर. दोनों को एक-दूसरे से अलग देख या समझ पाना बिलकुल असंभव है.
जब साई भक्ति की राह पर चलते हुए अपने ईश्वर से एक हो गए हैं तो क्या साई को हम उनकी भक्ति करके नहीं पा सकते? सोचना होगा कि हम साई से चाहते हैं या साई को चाहते हैं.   
                  
बाबा भली कर रहे।।
श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तुशुभं भवतु

2 comments:

  1. Om bhagwan sachinandan satgur sai nath maharaj ki jai sai baba bless you all the time i am from kenya my whats apps is +254788400148 add group

    ReplyDelete